यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
जब मनुष्य अपने आप को पाप से निकालने का बीड़ा उठाते हैं, और अपने आत्मिक शत्रुओं का सामना करने के लिए अपने ही बल पर अपने को बलवान समझते हैं, तब वे मसीह को कभी पूरी तरह ग्रहण नहीं करते, और न पाप से बचाए जाने के लिए केवल उसी पर भरोसा रखते हैं। परन्तु जब वे अपनी चौकसी और प्रार्थनाओं के द्वारा, और संकल्पों और शपथों से अपने आप को परमेश्वर की आज्ञा मानने के लिए बाँधकर, अपने आप को सँभाले रखने का प्रयत्न कर चुकते हैं, और पाते हैं कि आखिरकार, यदि उन्हें उन्हीं पर छोड़ दिया जाए, तो उनमें भ्रष्टता के सिवा और कुछ नहीं, तब वे अपनी असहायता को अनुभव करते हैं, और पूछने लगते हैं कि वे क्या करें? बाइबल यह सब काफ़ी स्पष्ट रूप से सिखाती है, और यदि लोग बाइबल पर विश्वास करते, तो नए विश्वासी आरम्भ में ही अपनी असहायता को, और पाप से बचानेवाले एक उद्धारकर्ता की अपनी आवश्यकता को जान लेते। परन्तु वास्तव में, वे इस विषय पर बाइबल को तब तक न ग्रहण करते हैं और न उस पर विश्वास करते हैं, जब तक वे अपनी निज धार्मिकता कमाने में न लग जाएँ, और इस प्रकार प्रयोग करके यह न जान लें कि मसीह के बिना वे कुछ भी नहीं हैं। और इसलिए वे उसे इस सम्बन्ध में तब तक ग्रहण नहीं करते, जब तक वे, सम्भवतः वर्षों तक, पवित्रीकरण का कार्य स्वयं करने के इन व्यर्थ और आत्म-धार्मिक प्रयत्नों में न बिता दें। आत्मा की रीति पर आरम्भ करके वे अब शरीर की रीति पर सिद्ध बनने का प्रयत्न कर रहे हैं।
(2.) दूसरे लोग, जब अपनी दशा को देखते हैं, तो मसीह को पाप से बचानेवाले उद्धारकर्ता के रूप में ग्रहण नहीं करते, क्योंकि आखिरकार वे सब पापों को त्यागने के लिए तैयार नहीं होते।
वे जानते हैं कि यदि वे अपने आप को पूरी तरह मसीह को सौंप दें, तो सब पाप छोड़ने ही होंगे; और उनके पास कोई न कोई ऐसी मूरत है जिसे वे छोड़ना नहीं चाहते।
(3.) कभी-कभी, जब लोगों को गहरा बोध होता है, और वे यह जानने के लिए व्याकुल होते हैं कि पाप से छुटकारा पाने के लिए वे क्या करें, तब भी वे विश्वास के साथ मसीह के पास नहीं जाते, क्योंकि वे नहीं जानते कि उन्हें उससे क्या आशा रखने का अधिकार है।
बहुत-से ऐसे हैं जो यह मानते हुए दिखते हैं कि वे पाप करने की किसी घातक विवशता के अधीन हैं, और इसका कोई उपाय नहीं, बल्कि उन्हें पाप के इस बोझ को मृत्यु तक घसीटते रहना होगा। वे परमेश्वर पर सीधे-सीधे मूर्खता से दोष नहीं लगाते, और शब्दों में यह नहीं कहते कि उसने ऐसी स्थिति के लिए कोई प्रावधान नहीं किया। परन्तु वे यह मानते हुए दिखते हैं कि मसीह का प्रायश्चित इतना महान है कि सब पापों को ढाँप लेता है, और परमेश्वर की दया इतनी महान है, कि यदि वे अपने सारे दिन पाप में चलते भी रहें, जैसा कि वे आशा करते हैं कि वे चलेंगे, तो भी वह अन्त में सब कुछ क्षमा कर देगा, और अन्त में बात लगभग उतनी ही अच्छी रहेगी मानो वे सचमुच पवित्र किए गए हों। वे यह नहीं देखते कि सुसमाचार ने हमें सब पाप करने से सदा के लिए छुटकारा देने के लिए पर्याप्त प्रावधान किया है। वे उसे मात्र क्षमा की एक व्यवस्था के रूप में देखते हैं, जो पापी को स्वर्ग के द्वार तक अपने पाप का बोझ घसीटते रहने के लिए छोड़ देती है; न कि एक ऐसी व्यवस्था के रूप में जो मन में पाप की शक्ति को ही तोड़ डाले। परिणाम यह होता है कि वे प्रतिज्ञाओं को बहुत कम महत्व देते हैं। ओह, मसीही बाइबल की उन बहुत ही बड़ी और बहुमूल्य प्रतिज्ञाओं का कितना कम उपयोग करते हैं, जो विशेष रूप से इसी उद्देश्य से दी गई थीं कि हम ईश्वरीय स्वभाव के सहभागी हो जाएँ! यहाँ परमेश्वर ने इसी उद्देश्य के लिए अपनी प्रतिज्ञाओं को हमारी आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया है, और हमें केवल इतना करना है कि जो कुछ हमें चाहिए, उसके लिए उसी से माँगें, और हमारे पवित्रीकरण के लिए जिस किसी वस्तु की आवश्यकता है, वह हमें मिलेगी। उद्धारकर्ता को यह कहते सुनिए, “जो कुछ तुम प्रार्थना करके मांगो तो प्रतीति कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हारे लिये हो जाएगा।”
