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छोटी बातों में बेईमान है, तो वह ठीक-ठीक अर्थ में ज़रा भी ईमानदार नहीं है। अब, यहाँ कुछ तथ्य हैं, जो बहुतों को इसके विपरीत प्रतीत होते हैं। हम ऐसे बहुत-से मनुष्य देखते हैं जो छोटी बातों में सिद्धान्त का बड़ा अभाव प्रकट करते हैं, और पूरी तरह सिद्धान्तहीन प्रतीत होते हैं, जबकि बड़ी बातों में वे प्रतिष्ठित, वरन् भक्त भी दिखाई देते हैं। यह बात संगत होनी चाहिए, नहीं तो यीशु मसीह ने एक झूठी बात कही है। यह सत्य से संगत है, यह बात मान ली जाएगी, यदि हम दिखा सकें कि बड़े मामलों में उनके आचरण का कारण हृदय की ईमानदारी के अलावा अन्य सिद्धान्तों से समझाया जा सकता है।
यदि हम इसे निरे स्वार्थ के सिद्धान्तों से समझा सकें, तो यह मान लिया जाएगा कि जहाँ कोई मनुष्य छोटी बातों में बेईमान है, वहाँ वह वास्तव में ज़रा भी ईमानदार नहीं, चाहे बड़े मामलों में वह कितनी भी ईमानदारी से काम करे।
1. वे बदनामी के डर से बड़े मामलों में ईमानदारी से काम कर सकते हैं।
वे जान सकते हैं कि कुछ छोटी बातों की सार्वजनिक चर्चा होने या उन पर शोर मचने की सम्भावना नहीं, और इसलिए वे ऐसे काम कर सकते हैं, जबकि बदनामी का डर उन्हें बड़े मामलों में वही काम करने से रोकता है, क्योंकि उस पर शोर मचेगा। यह स्वार्थ के एक रूप का दूसरे रूप पर भारी पड़ जाने के सिवा और क्या है? यह फिर भी स्वार्थ ही है, ईमानदारी नहीं।
2. वह सोच सकता है कि यदि वह व्यापारियों के साथ बेईमानी का दोषी हो, तो इससे उसके व्यापार को हानि पहुँचेगी, और इसलिए वह महत्त्वपूर्ण मामलों में ईमानदारी से लेन-देन करता है, जबकि छोटी बातों में वह हर वह लाभ उठाने को तैयार रहता है जो उसके व्यापार को हानि न पहुँचाए। इस प्रकार एक मनुष्य किसी सिलाई करनेवाली स्त्री का अनुचित लाभ उठाएगा, और किसी वस्त्र की सिलाई के लिए उसे उससे कुछ कम देगा जितना वह जानता है कि वास्तव में उसका मूल्य है, जबकि वही व्यक्ति कपड़े की एक गाँठ ख़रीदते समय धोखा देने की प्रवृत्ति प्रकट करने की बात सोचेगा भी नहीं, क्योंकि इससे उसके व्यापार को हानि पहुँचेगी। किसी सताए हुए और दीन व्यक्ति के साथ लेन-देन में वह सार्वजनिक बदनामी के डर के बिना कुछ पैसे दबोच और निचोड़ सकता है, जबकि वह किसी भी क़ीमत पर ऐसा कोई काम न करेगा जिसकी लोगों में अपमानजनक और नीच काम के रूप में चर्चा हो।
3. मानवीय क़ानून का डर किसी मनुष्य को उन बातों में ईमानदारी से काम करने के लिए प्रेरित कर सकता है जिन पर कार्रवाई होने की सम्भावना है, जबकि ऐसी छोटी बातों में, जिन पर क़ानून का ध्यान जाने की सम्भावना नहीं, वह धोखा देगा या अनुचित लाभ उठाएगा।
4. प्रशंसा का प्रेम बहुतों को उन मामलों में ईमानदारी और प्रतिष्ठा से, वरन् भक्तिपूर्वक भी, काम करने के लिए प्रेरित करता है जिन पर लोगों का ध्यान जाने की सम्भावना है। बहुत-से मनुष्य मज़दूरी के दाम में किसी ग़रीब व्यक्ति के कुछ पैसे ठग लेंगे, और फिर किसी सार्वजनिक अवसर पर किसी बड़े मामले में बड़ी उदारता से काम करते दिखाई देंगे। इसका क्या कारण है कि जो व्यक्ति अपने नौकरों को, और सिलाई करनेवाली स्त्रियों को, और अपने यहाँ काम करनेवाले अन्य ग़रीब लोगों को आदतन अन्तिम पैसे तक दबाकर रखते हैं, और ऐसे लोगों का जितना अनुचित लाभ उठा सकें उठाते हैं, वे ही, यदि कड़ाके का जाड़ा आए, तो ग़रीबों को गाड़ियाँ भर-भरकर ईंधन भेजेंगे, या समितियों को बड़ी-बड़ी रक़में देंगे? आप देखते हैं कि यह प्रशंसा के प्रेम के कारण है, न कि परमेश्वर के प्रेम के कारण, और न मनुष्य के प्रेम के कारण।
5. परमेश्वर का भय। वह डर सकता है कि यदि वह महत्त्वपूर्ण बेईमानी के काम करे तो ईश्वरीय क्रोध उस पर भड़केगा, जबकि वह सोचता है कि परमेश्वर छोटी बातों को अनदेखा कर देगा, और यदि वह ऐसी छोटी बातों में बेईमानी करे तो उस पर ध्यान नहीं देगा।
