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अध्याय 2: झूठे अंगीकार करनेवाले।
सब्त क्यों मानते हैं, या धार्मिक उद्देश्यों के लिए अपनी संपत्ति क्यों देते हैं? आप उत्तर देते हैं, “अपने उद्धार को बढ़ावा देने के लिए।” सचमुच! परमेश्वर की महिमा करने के लिए नहीं, बल्कि स्वर्ग पहुँचने के लिए! क्या आप नहीं सोचते कि यदि शैतान यह समझता कि वह इसके द्वारा अपना उद्देश्य प्राप्त कर सकता है और फिर भी शैतान ही बना रह सकता है, तो वह भी यह सब करता? स्वार्थ का सबसे ऊँचा रूप तो यही होगा कि परमेश्वर को, उसके सब गुणों समेत, आपके महान “स्व” की सेवा में भर्ती कर लिया जाए।
और अब, मेरे श्रोताओ, आप सब कहाँ हैं? क्या आप यहोवा की सेवा कर रहे हैं, या अपने ही देवताओं की सेवा कर रहे हैं? इन छः महीनों में, जब मैं यहाँ से अनुपस्थित रहा, आपका क्या हाल रहा है? क्या आपने परमेश्वर के लिए कुछ किया है? क्या आप परमेश्वर के सेवकों के समान जीवन बिताते रहे हैं? क्या आपके किए हुए कामों से शैतान का राज्य निर्बल हुआ है? क्या आप अब कह सकते हैं, “मेरे साथ आइए, और मैं आपको दिखाऊँगा कि इस और उस पापी का मन-परिवर्तन हुआ है, या यह और वह पीछे हटनेवाला वापस लाया गया है, या इस और उस निर्बल संत को दृढ़ किया गया और सहायता दी गई है?” क्या आप परमेश्वर की सेवा में किए गए अपने कामों के जीवित गवाह ला सकते हैं? या आपका उत्तर यह होगा, “मैं सब्त के दिन नियमित रूप से सभा में जाता रहा हूँ, और मैंने बहुत-सा अच्छा प्रचार सुना है, और मैं प्रायः प्रार्थना-सभाओं में उपस्थित रहा हूँ, और हमारी कुछ बहुमूल्य सभाएँ हुईं, और मैंने अपने परिवार में प्रार्थना की है, और दिन में दो या तीन बार अपनी कोठरी में प्रार्थना की है, और बाइबल पढ़ी है।” और इन सब में, जहाँ तक परमेश्वर के लिए कुछ करने की बात है, आप केवल निष्क्रिय रहे हैं। आप प्रभु का भय भी मानते रहे, और अपने ही देवताओं की सेवा भी करते रहे।
“हाँ, परन्तु मैंने इतना माल बेचा है, और इतना धन कमाया है, जिसका दसवाँ भाग मैं मिशनरी कार्य को देने का विचार रखता हूँ।” आत्माओं को बचाने के बदले, आप से यह किस ने चाहा है? अन्यजातियों के पास सुसमाचार भेजने चले हैं, और अपनी ही आँखों के सामने पापियों को नरक में जाने देते हैं! धोखा न खाइए। यदि आप आत्माओं से प्रेम करते, यदि आप परमेश्वर की सेवा करने में लगे होते, तो आप यहाँ की आत्माओं के विषय में सोचते, और यहीं परमेश्वर का काम करते। हम ऐसे मिशनरी के विषय में क्या सोचें जो अन्यजातियों के पास जा रहा हो, पर जिसने अपने घर पर अपने आस-पास के पापियों से कभी एक शब्द भी न कहा हो?
क्या वह आत्माओं से प्रेम करता है? ऐसे मनुष्य को अन्यजातियों के पास भेजने का विचार ही हास्यास्पद है।
जो मनुष्य अपने घर पर कुछ नहीं करेगा, वह अन्यजातियों के पास जाने के योग्य नहीं है। और जो यहाँ पापियों को बचाने का प्रयत्न तो नहीं करेगा, पर मिशनों के लिए धन कमाने का दिखावा करता है, वह घोर कपटी है।
