व्याख्यान 108 (253 में से)

यदि इतनी थोड़ी-सी बात के लिए वह अपनी खराई को भुला देगा, और बेईमानी का काम करेगा, तो वह इतना भला नहीं

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यदि इतनी थोड़ी-सी बात के लिए वह अपनी खराई को भुला देगा, और बेईमानी का काम करेगा, तो वह इतना भला नहीं कि राजकोष को लूटने से रुक जाए।

1. मनुष्य के हृदय की वास्तविक दशा प्रायः बड़े महत्त्व के कामों की अपेक्षा छोटी बातों में अधिक प्रकट होती है।

मनुष्य यहाँ प्रायः धोखा खाते हैं, और सोचते हैं कि छोटी बातों में उनकी धूर्तता के बावजूद, बड़ी बातों में उनका ईमानदार होना उनके हृदय की ईमानदारी को प्रमाणित करेगा; और इसलिए वे बड़ी बातों में तो अवश्य चौकस रहते हैं, जबकि छोटी बातों में लापरवाह रहते हैं, और इस प्रकार अपना सच्चा चरित्र प्रकट कर देते हैं। वे इस तथ्य को अनदेखा कर देते हैं कि बड़े मामलों में उनकी सारी ईमानदारी एक ग़लत सिद्धान्त से, ईमानदार “दिखने” की इच्छा से उपजती है, न कि ईमानदार होने के दृढ़ निश्चय से। वे अपनी छोटी-छोटी धोखाधड़ियों को अनदेखा कर देते हैं क्योंकि वे अपने चरित्र के अधिक सार्वजनिक प्रदर्शनों की चौकसी करते हैं, और फिर यह मान लेते हैं कि वे ईमानदार हैं, जबकि वे हृदय में सड़ाहट के सिवा और कुछ नहीं। जो मनुष्य छोटी बातों में, जहाँ उस पर निगरानी नहीं है, अनुचित लाभ उठाएगा, वह सिद्धान्त से प्रेरित नहीं है। यदि आप अपना वास्तविक चरित्र जानना चाहते हैं, तो अपने हृदयों की चौकसी कीजिए, और देखिए कि छोटी बातों में आपके सिद्धान्त किस प्रकार प्रकट होते हैं।

उदाहरण के लिए, मान लीजिए आप केवल स्वामी की आँखों के सामने सेवा करनेवाले हैं। आप किसी दूसरे की सेवा में लगे हैं, और अपने मालिक की अनुपस्थिति में कभी-कभी थोड़ी देर के लिए निठल्ले रहने में आपको कोई संकोच नहीं होता।

या जब आप अपने मालिक की आँख के सामने नहीं होते, तब आप अपने काम में ऐसी ढिलाई करते हैं जैसी आप उसके उपस्थित होने पर न करते। जो मनुष्य ऐसा करेगा, वह पूरी तरह बेईमान है, और किसी भी बात में भरोसे के योग्य नहीं, और बहुत सम्भव है कि वह अपने मालिक के बटुए से पैसा निकाल लेता, यदि पकड़े जाने का डर या कोई और उतनी ही स्वार्थी प्रेरणा न होती। ऐसा व्यक्ति ज़रा भी भरोसे के योग्य नहीं, सिवाय उन परिस्थितियों के जहाँ ईमानदार रहना उसके हित में हो।

जो कारीगर अपने काम में ढिलाई करते हैं जब वह उनके मालिक द्वारा देखा या जाना न जाएगा, वे हृदय में सड़े हुए हैं, और ज़रा भी भरोसे के योग्य नहीं, सिवाय उस सीमा तक जहाँ तक आप ईमानदार रहना उनके हित की बात बना सकें।

जो लोग बातचीत में जान-बूझकर तथ्यों को ग़लत ढंग से कहते हैं, वे अवसर और दण्ड से बच निकलने की सुविधा मिलने पर अदालत में शपथ खाकर झूठी गवाही देंगे। वे सत्य को कभी इसलिए नहीं बोलते कि वह सत्य है, या सत्य के प्रेम से। ऐसे किसी मनुष्य पर भरोसा न किया जाए।

जो बातचीत में अपवित्र हैं, वे अवसर और दण्ड से बच निकलने की सुविधा मिलने पर आचरण में भी अपवित्र होंगे। उस पुरुष या स्त्री को ठुकरा दीजिए जो अपने ही लिंग के लोगों के बीच भी वाणी में अशुद्ध होगा; उनमें कोई सिद्धान्त नहीं है, और उनके सिद्धान्तों के आधार पर उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता। यदि लोग सिद्धान्त के कारण पवित्र हैं, तो वे अशुद्ध बातचीत में उतना ही लिप्त न होंगे जितना अशुद्ध कामों में। वे उस वस्त्र से भी घृणा करेंगे जो शरीर के द्वारा कलंकित हो गया है।

2. जो व्यक्ति किसी एक पाप में लिप्त रहेगा, वह किसी भी पाप से इसलिए दूर नहीं रहता कि वह पाप है। यदि वह पाप से घृणा करता, और पाप का इसलिए विरोधी होता कि वह पाप है, तो वह एक पाप में उतना ही लिप्त न होता जितना दूसरे में। यदि कोई व्यक्ति पापों में से छाँट-छाँटकर चुनने लगता है, कुछ से बचता है, और

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