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इस प्रकार ये लोग, जो परमेश्वर और मनुष्य के सच्चे मित्र हैं, जो कुछ गलत है उसके लिए सदा अपने ही विरुद्ध शिकायत करने, और अपने आप को ही दोष देने और दोषी ठहराने को तैयार रहते हैं। परन्तु आप उन्हें कभी परमेश्वर में दोष निकालते हुए नहीं देखते। आप उन्हें कभी अपने आप को निर्दोष ठहराते और यह कहकर सारा दोष अपने सृजनहार पर डालते हुए नहीं सुनते कि वे परमेश्वर की आज्ञा मानने में असमर्थ हैं, और न ही वे कभी ऐसे बोलते हैं मानो परमेश्वर ने अपने प्राणियों से असम्भव बातों की माँग की हो। वे सदा ऐसे बोलते हैं मानो वे अनुभव करते हों कि परमेश्वर ने जो कुछ माँगा है वह उचित और न्यायसंगत है, और अपनी आज्ञा न मानने के लिए केवल वे स्वयं ही दोषी हैं।
2. वे दूसरे लोगों के पापों के प्रति गहरी घृणा प्रकट करते हैं।
वे दूसरों के पापों पर पर्दा नहीं डालते, न उनकी वकालत करते और न उनके लिए बहाने बनाते हैं, और न “शायद यह” या “शायद वह” कहकर उन्हें हल्का करके टाल देते हैं। आप उन्हें कभी पाप की सफ़ाई देते हुए नहीं सुनते। जैसे वे अपने भीतर के पाप पर क्रोधित होते हैं, वैसे ही जब वे उसे दूसरों में देखते हैं, तब भी उतने ही क्रोधित होते हैं।
वे उसके भयानक स्वभाव को जानते हैं, और सदा उससे घृणा करते हैं।
3. एक और बात जिसमें यह आत्मा प्रकट होती है, वह है परमेश्वर के आदर और महिमा के लिए उत्साह।
वे परमेश्वर के आदर और हित को बढ़ाने के लिए वैसा ही उत्साह दिखाते हैं जैसा एक सच्चा देशभक्त अपने देश के आदर और हित को बढ़ाने के लिए दिखाता है। यदि वह अपने देश से, उसकी सरकार से और उसके हित से बहुत प्रेम करता है, तो वह अपना मन उसकी उन्नति और भलाई को बढ़ाने में लगा देता है।
वह कभी इतना प्रसन्न नहीं होता जितना तब, जब वह अपने देश के आदर और उन्नति के लिए कुछ कर रहा होता है। इसी प्रकार जो बालक अपने पिता से सच्चा प्रेम करता है, वह कभी इतना प्रसन्न नहीं होता जितना तब, जब वह अपने पिता के आदर और हित को बढ़ा रहा होता है। और वह कभी इतने क्रोध-भरे शोक का अनुभव नहीं करता जितना तब, जब वह अपने पिता का अपमान होते या उसे हानि पहुँचते देखता है। यदि वह देखता है कि जिन लोगों को उसके पिता की आज्ञा माननी, उससे प्रेम करना और उसका आदर करना चाहिए, वही उसकी आज्ञा तोड़ते या उसका अपमान करते हैं, तो उसका हृदय क्रोध-भरे शोक से फट पड़ता है।
धर्म का अंगीकार करनेवाले ऐसे असंख्य मसीही हैं, और पादरी भी, जो अपने चरित्र और अपने आदर की रक्षा करने में बड़े उत्साही हैं। परन्तु यह एक वर्ग परमेश्वर के आदर की रक्षा करते या उसे बढ़ाते समय कहीं अधिक लगन अनुभव करता है, और तब उनके हृदय और भी तेज़ी से धड़कते हैं। ये ही परमेश्वर और मनुष्य के मित्र हैं।
4. वे दिखाते हैं कि मनुष्य के प्रति परमेश्वर की जो भावनाएँ हैं, उनमें वे परमेश्वर के सहभागी हैं।
प्राणों के प्रति उनमें उसी प्रकार की मित्रता होती है जैसी परमेश्वर अनुभव करता है। मेरा अर्थ यह नहीं कि वे उसी मात्रा में अनुभव करते हैं, परन्तु यह कि उनमें उसी प्रकार की भावनाएँ होती हैं। मनुष्यों के प्राणों से प्रेम करना और साथ ही उनके आचरण से घृणा भी करना—ऐसी बात सचमुच होती है। एक स्वभावगत सहानुभूति भी होती है, जो लोग संकट में पड़े हुओं के लिए अनुभव करते हैं। यह स्वाभाविक है। संकट में पड़े किसी व्यक्ति के लिए आप सदा यह अनुभव करते हैं, जब तक कि आपके पास उसके प्रति द्वेष रखने का कोई स्वार्थी कारण न हो।
यदि आप किसी हत्यारे को फाँसी पर लटकाए जाते देखें, तो आपको उस पर तरस आएगा। दुष्ट लोगों में भी दुख उठानेवालों के लिए यह स्वाभाविक सहानुभूति होती है।
परन्तु एक और विशेष प्रकार की सहानुभूति है जो परमेश्वर की सच्ची सन्तान पापियों के प्रति अनुभव करती और प्रकट करती है। यह घृणा और करुणा की, अर्थात् उसके पापों के विरुद्ध रोष और उसके व्यक्तित्व के प्रति दया की, मिली-जुली भावना है। पाप के प्रति ऐसी गहरी घृणा के साथ-साथ उन प्राणों के प्रति गहरी करुणा अनुभव करना सम्भव है, जो ऐसे अनन्त आनन्द के योग्य हैं, और फिर भी अनन्त दुर्दशा की ओर जा रहे हैं।
