व्याख्यान 76 (253 में से)

सिवाय उस हद तक जहाँ तक वह परमेश्वर की महिमा करने का साधन बन सके। आपके विचार में इसका क्या प्रभाव होगा?

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सिवाय उस हद तक जहाँ तक वह परमेश्वर की महिमा करने का साधन बन सके। आपके विचार में इसका क्या प्रभाव होगा?

यरूशलेम में इसका क्या प्रभाव पड़ा था, जब मसीहियों के सारे समुदाय ने अपना काम-धन्धा छोड़ दिया, और एक देह होकर संसार के उद्धार के काम में निकल पड़े? वे केवल थोड़े-से अनपढ़ मछुए और थोड़ी-सी दीन स्त्रियाँ थे, परन्तु उन्होंने जगत को उलटा-पुलटा कर दिया।

कलीसिया अब ऐसा जीवन बिताए, तो वह संसार के मुँह पर लज्जा छा देगी, और उसे पाप के बोध से अभिभूत कर देगी। संसार केवल कलीसिया को संसार से ऊपर उठकर जीते हुए, और सुसमाचार के सिद्धान्तों पर व्यापार करते हुए, अपने हित नहीं वरन अपने संगी मनुष्यों के हित को ढूँढ़ते हुए देख ले, तो अविश्वास अपना सिर छिपा लेगा, कुपंथ कलीसिया से खदेड़ दिया जाएगा, और प्रेम की यह मनोहर, धन्य आत्मा समुद्र की लहरों के समान सारे संसार पर फैल जाएगी।

दूसरा: फ़ैशन के विषय में।

मसीहियों से यह माँग क्यों की गई है कि वे संसार के फ़ैशनों के पीछे न चलें?

1. क्योंकि यह सुसमाचार की आत्मा से सीधे युद्ध करता है, और पृथ्वी की वस्तुओं पर मन लगाना है।

यदि संसार के फ़ैशनों के पीछे चलना, जो ज्वार के समान निरन्तर इधर-उधर बहते रहते हैं, और अपने रूपों में उतार-चढ़ाव करते रहते हैं, और संसार को लगातार बदलते रहते हैं, पृथ्वी की वस्तुओं पर मन लगाना नहीं है, तो फिर पृथ्वी की वस्तुओं पर मन लगाना क्या है? संसार में बड़े कारोबारवाले बहुत-से लोग, और धनवान लोग हैं, जो समझते हैं कि उन्हें फ़ैशनों की कोई परवाह नहीं। वे किसी और बात में लगे रहते हैं, और फ़ैशनों का सारा भार अपने दर्ज़ी पर छोड़ देते हैं, यह मानकर कि वह सब कुछ ठीक कर देगा। परन्तु ध्यान दीजिए, यदि वह कोई वस्त्र फ़ैशन के विरुद्ध बना दे, तो आप देखेंगे कि उन्हें फ़ैशनों की परवाह है, और वे उस दर्ज़ी को फिर कभी काम पर नहीं रखेंगे। फिर भी, इस समय उनके विचार फ़ैशनों पर अधिक नहीं हैं। उनके सामने एक ऊँचा लक्ष्य है। और वे समझते हैं कि फ़ैशनों के विषय में प्रचार करना किसी पादरी की गरिमा के योग्य नहीं है। वे इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि मनुष्यजाति के अधिकांश भाग के लिए फ़ैशन ही सब कुछ है। समाज का अधिकांश भाग धनी नहीं है, और न कभी धनी होने की आशा रखता है, परन्तु वह संसार की ओर इसलिए देखता है कि उसके द्वारा वह “प्रतिष्ठित” दिखाई दे सके, और अपने परिवारों का पालन-पोषण “प्रतिष्ठित” रीति से कर सके; अर्थात “फ़ैशनों के पीछे चल सके।” जनसंख्या के दस में से नौ भाग संसार के समान करने, या फ़ैशनों के पीछे चलने से ऊँची किसी बात की ओर कभी देखते ही नहीं। इसके लिए वे अपनी हर नस तान देते हैं। और इसी पर वे अपना मन लगाते हैं, और इसी के लिए वे जीते हैं।

इसलिए यदि व्यापारी और धनी मनुष्य यह समझता है कि फ़ैशन एक छोटी बात है, तो वह अपने आप को धोखा देता है। जनसाधारण का बड़ा भाग इसी पर ध्यान देता है, उनके मन इसी पर लगे रहते हैं; जीवन में वे जिस बात की खोज करते हैं, वह यह है कि उनके वस्त्र, सवारी, घर का साज-सामान इत्यादि दूसरे लोगों के समान फ़ैशन के अनुसार हों, या जैसा वे कहते हैं, “प्रतिष्ठित” हों।

2. संसार के सदृश बनना उनके अंगीकार के विपरीत है।

जब लोग कलीसिया में सम्मिलित होते हैं, तो वे उस आत्मा को त्यागने का अंगीकार करते हैं जिससे फ़ैशन जन्म लेते हैं। वे अंगीकार करते हैं कि वे संसार की धूमधाम और व्यर्थ बातों को त्याग देंगे, अपने घमण्ड से पश्चाताप करेंगे, नम्र और दीन उद्धारकर्ता के पीछे चलेंगे, परमेश्वर के लिए जीएँगे। और अब, वे क्या करते हैं? आप

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