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दण्ड के खतरे से बच निकलने के लक्ष्य की ओर मुड़ता है, इसलिए वह किसी और रास्ते से स्वर्ग तक पहुँचने का प्रयत्न करता है। मैं नहीं मानता कि इतिहास में ऐसे किसी मनुष्य का एक भी उदाहरण है जो तब तक परमेश्वर के अधीन हुआ हो, जब तक उसने यह न देख लिया हो कि उद्धार विश्वास के द्वारा ही होना चाहिए, और कि उसके अपने स्वधार्मिक प्रयत्नों में उसका उद्धार करने की कोई क्षमता नहीं है।
फिर; यदि आप व्यवस्था-सम्बन्धी प्रेरणाओं के द्वारा पवित्रता उत्पन्न करने का प्रयत्न करते हैं, तो असफलता का भय ही ध्यान को प्रेम के विषयों से, अर्थात परमेश्वर और मसीह से, हटा देता है। पापी सारा समय सीनै पर्वत के चारों ओर चक्कर लगाता रहता है, और अपने कदमों पर ध्यान देता रहता है, यह देखने के लिए कि वह आज्ञाकारिता के कितने निकट पहुँचा है; तो फिर वह स्वर्ग की आत्मा में कैसे प्रवेश कर सकता है?
फिर; व्यवस्था का दण्ड पहले-पहल प्रेम उत्पन्न करने की कोई प्रवृत्ति नहीं रखता। जिनमें प्रेम पहले से है, उनमें वह प्रेम को बढ़ा सकता है, जब वे उसे परमेश्वर की असीम पवित्रता के प्रदर्शन के रूप में देखते हैं। स्वर्ग के स्वर्गदूत, और पृथ्वी के भले लोग, उसकी उचितता और योग्यता पर मनन करते हैं, और उसमें अपने प्राणियों के प्रति परमेश्वर की सद्भावना की अभिव्यक्ति देखते हैं, और वह उन्हें मनोहर और सुन्दर लगता है, और परमेश्वर में उनके आनन्द को और उस पर उनके भरोसे को बढ़ाता है। परन्तु स्वार्थी मनुष्य के साथ ठीक इसका उलटा होता है। वह दण्ड को अपने ही सिर पर लटकता हुआ देखता है, और बच निकलने का कोई मार्ग नहीं देखता, और मन का यह स्वभाव ही नहीं कि वह उस प्राणी पर मोहित हो जाए जो उसके शापित सिर के ऊपर वज्र थामे हुए है। मन के स्वभाव के कारण वह उससे दूर भागेगा, उसकी ओर नहीं। ऐसा लगता है कि प्रेरणा पाए हुए लेखकों ने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि व्यवस्था मनुष्यों को पवित्र कर सकती है। व्यवस्था तो जिलाने के लिए नहीं, बल्कि मार डालने के लिए दी गई है, कि मनुष्यों की स्वधार्मिक आशाओं को सदा के लिए काट डाले, और उन्हें मसीह की ओर भागने पर विवश करे।
फिर; पापी, केवल नंगी व्यवस्था के अधीन, और सुसमाचार को छोड़कर — मैं कहता हूँ, पापी, ऐसी परिस्थितियों में, स्वाभाविक रूप से और अनिवार्य रूप से, और उचित रूप से ही, परमेश्वर को एक ऐसा शत्रु समझते हैं जिससे मेल नहीं हो सकता।
वे पूर्णतः स्वार्थी हैं; और सुसमाचार के विचारों से अलग, वे परमेश्वर को ठीक वैसे ही देखते हैं जैसे शैतान उसे देखता है। व्यवस्था में ऐसी कोई प्रेरणा नहीं जो स्वार्थी मन के सामने रखी जाए और प्रेम उत्पन्न कर दे। क्या दण्ड का प्रभाव यह कर सकता है?
मनुष्यों को सुधारने के लिए उन्हें नरक में भेजना — सुधार की यह कैसी विचित्र योजना है! उन्हें जीवन के अन्त तक पाप और विद्रोह में चलते रहने दो, और फिर उसे तब तक दण्ड दिया जाए जब तक वह पवित्र न हो जाए। मुझे आश्चर्य है कि शैतान अब तक पवित्र क्यों नहीं हो गया! उसने काफ़ी समय तक दुःख भोगा है, वह इन हज़ारों वर्षों से नरक में है, और वह जैसा था उससे तनिक भी अच्छा नहीं हुआ। इसका कारण यह है कि वहाँ कोई सुसमाचार नहीं, और सत्य को लागू करने के लिए कोई पवित्र आत्मा नहीं, और दण्ड केवल उसके विद्रोह को और पक्का करता है।
फिर: धर्मी ठहराए जाने की शिक्षा इन कठिनाइयों को दूर कर सकती है। यह व्यवस्था की आज्ञा का वास्तविक पालन उत्पन्न कर सकती है, और उसने उत्पन्न किया है। विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना व्यवस्था को कर्तव्य के नियम के रूप में एक ओर नहीं रखता, बल्कि केवल व्यवस्था के दण्ड को एक ओर रखता है। और विश्वास के साधारण कार्य पर दिए जानेवाले केवल एक सेंत-मेंत के दान के रूप में धर्मी ठहराए जाने का प्रचार ही एकमात्र रीति है जिससे कभी व्यवस्था का पालन होता है। यह मैं अब निम्नलिखित विचारों से दिखाऊँगा:
1. यह मन को उन विचारों के दबाव से छुटकारा देता है जो स्वाभाविक रूप से स्वार्थ को पक्का करने की प्रवृत्ति रखते हैं।
