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अन्य सब मनुष्यों के सुख और परमेश्वर की महिमा से बढ़कर मानें। और यह कि यदि हम ऐसा करें, तो क्या हम सच्चे धर्म की माँगों के अनुसार चलते हैं, या सच्चे धर्म के विपरीत। जाँच का उचित विषय यही है, और मैं चाहता हूँ कि आप इसे निरन्तर ध्यान में रखें, और इसे उन दूसरी बातों में से किसी के साथ न मिलाएँ जिनका मैंने उल्लेख किया है।
III. अब इस प्रस्ताव के प्रमाण की ओर।
इस प्रस्ताव को, कि अपने ही सुख को सर्वोपरि मानना सच्चे धर्म के विपरीत है, प्रमाणित करने से पहले मैं यह कहूँगा कि सारा सच्चा धर्म परमेश्वर के समान होने में है; अर्थात् उन्हीं सिद्धान्तों और उन्हीं आधारों पर काम करने में, और भिन्न-भिन्न वस्तुओं के प्रति वैसी ही भावनाएँ रखने में। मैं समझता हूँ कि इस बात से इनकार नहीं किया जाएगा। वास्तव में, कोई भी स्वस्थ बुद्धि इससे इनकार नहीं कर सकती। तब मैं इस प्रस्ताव के पहले प्रमाण के रूप में यह कहता हूँ,
1. कि अपने ही सुख को सर्वोपरि मानना परमेश्वर के उदाहरण के अनुसार नहीं है; वरन् यह उससे पूरी तरह भिन्न होना है।
बाइबल हमें बताती है कि “परमेश्वर प्रेम है।” अर्थात्, परोपकार (निःस्वार्थ प्रेम) ही उसके चरित्र का सम्पूर्ण सार है।
उसके अन्य सब नैतिक गुण, जैसे न्याय, दया, और इसी प्रकार के दूसरे गुण, उसके परोपकार के ही भिन्न-भिन्न रूप हैं। उसका प्रेम दो रूपों में प्रकट होता है। एक है परोपकार का रूप, अर्थात् दूसरों का भला चाहना, या दूसरों के सुख की इच्छा करना। दूसरा है प्रसन्नता का रूप, अर्थात् उन दूसरों के चरित्र को सराहना जो पवित्र हैं। परमेश्वर का परोपकार उन सब प्राणियों का ध्यान रखता है जो सुख पाने के योग्य हैं। यह सार्वभौमिक है। सब पवित्र प्राणियों के प्रति वह प्रसन्नता का प्रेम प्रकट करता है।
दूसरे शब्दों में, परमेश्वर अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखता है। वह सब प्राणियों के हितों का, उनके सापेक्ष मूल्य के अनुसार, उतना ही ध्यान रखता है जितना अपने हित का। वह अपने सुख को, या अपनी महिमा को, सर्वोच्च भलाई मानकर खोजता है। परन्तु इसलिए नहीं कि वह उसका अपना है, वरन् इसलिए कि वह सर्वोच्च भलाई है। एक अनन्त प्राणी होने के नाते उसके सुख का कुल योग अन्य सब प्राणियों के सुख के कुल योग से, या किसी भी सम्भव संख्या के सीमित प्राणियों के सुख से, असीम रूप से बड़ा है।
एक बहुत ही परिचित उदाहरण लीजिए। यहाँ एक मनुष्य है जो पशुओं पर दया करता है। यह मनुष्य और उसका घोड़ा नदी में गिर पड़ते हैं। अब, क्या सच्चा परोपकार यह माँग करता है कि वह मनुष्य अपने घोड़े को निकालने के लिए स्वयं डूब जाए? नहीं। उसके लिए यह सच्चा निःस्वार्थ परोपकार होगा कि वह अपने आप को बचाए, और यदि आवश्यक हो, तो अपने घोड़े को नाश होने दे; क्योंकि उसका सुख घोड़े के सुख से कहीं अधिक मूल्यवान है। यह आप एक ही दृष्टि में देख लेते हैं। परन्तु परमेश्वर और सब सृजे हुए प्राणियों के बीच का अन्तर, एक मनुष्य और एक घोड़े के बीच के अन्तर से, या सबसे ऊँचे स्वर्गदूत और सबसे तुच्छ कीड़े के बीच के अन्तर से, असीम रूप से बड़ा है। इसलिए परमेश्वर सब प्राणियों के सुख को ठीक उसके वास्तविक मूल्य के अनुसार मानता है। और जब तक हम भी ऐसा ही न करें, हम परमेश्वर के समान नहीं हैं। यदि हम परमेश्वर के समान हैं, तो हमें परमेश्वर के सुख और महिमा को उसी दृष्टि से देखना होगा जिस दृष्टि से वह स्वयं देखता है; अर्थात् सर्वोच्च भलाई के रूप में, जो विश्व की हर दूसरी वस्तु से बढ़कर है। और यदि हम परमेश्वर के सुख से अधिक अपने सुख की इच्छा करते हैं, तो हम परमेश्वर से असीम रूप से भिन्न हैं।
2. अपने ही सुख को सर्वोपरि लक्ष्य बनाना सच्चे धर्म के विपरीत है, क्योंकि यह मसीह के आत्मा के विरुद्ध है।
हमें बताया गया है कि “यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।” और मनुष्य के रूप में उसके विषय में बार-बार कहा गया है कि उसने अपनी भलाई नहीं चाही, कि उसने अपनी
