व्याख्यान 65 (253 में से)

मसीह के राज्य के हितों के विरुद्ध है, फिर भी वे नहीं बदलेंगे। वे इसे

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मसीह के राज्य के हितों के विरुद्ध है, फिर भी वे नहीं बदलेंगे। वे इसे प्रगट कर देते हैं कि वे परमेश्वर की माँग का नहीं, बल्कि जनमत की माँग का आदर करते हैं। उन्हें मनुष्यों की प्रशंसा परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय लगती है।

8. इस प्रकार के लोग साधारणतः धर्मोन्मादी समझे जाने के विचार से बहुत अधिक डरते हैं।

व्यावहारिक रूप से वे धर्म के एक प्राथमिक सिद्धान्त से अनजान हैं, कि सारा संसार गलत है!

कि संसार का जनमत पूरी तरह परमेश्वर के विरुद्ध है, और हर वह व्यक्ति जो परमेश्वर की सेवा करना चाहता है, उसे सबसे पहले संसार के जनमत के विरुद्ध अपना मुँह कर लेना होगा।

उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि विद्रोहियों के संसार में, जनमत उतना ही निश्चित रूप से गलत है जितना यह निश्चित है कि परमेश्वर से विवाद चल रहा है। उनकी आँखें इस मूल सत्य के लिए कभी खुली ही नहीं कि संसार गलत है, और परमेश्वर के मार्ग उनके मार्गों के ठीक विपरीत हैं। फलस्वरूप, यह सच है, और सदा सच रहा है, कि “जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएँगे।” उन्हें धर्मोन्मादी, अंधविश्वासी, कट्टर, और ऐसे ही नाम दिए जाएँगे। वे सदा ऐसे कहलाते आए हैं, और जब तक संसार गलत है, तब तक सदा ऐसे ही कहलाते रहेंगे।

परन्तु इस वर्ग के लोग कभी भी उससे आगे नहीं जाएँगे जितना सांसारिक मनुष्यों की राय से मेल खाता है। वे कहते हैं कि ऐसे मनुष्यों पर प्रभाव रखने के लिए उन्हें यह और वह करना ही पड़ेगा।

इसके ठीक विपरीत परमेश्वर और मनुष्य के सच्चे मित्रों का मार्ग है। उनका मुख्य लक्ष्य संसार के क्रम को उलट देना, और जगत को उलटा-पुलटा कर देना है, ताकि सब मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा मानें, और मनुष्यों की सब रायें परमेश्वर के वचन के अनुरूप हो जाएँ, और संसार की सब रीतियाँ और संस्थाएँ सुसमाचार की आत्मा के अनुसार हो जाएँ।

9. वे दोनों ओर मित्र बनाने पर बहुत तुले रहते हैं।

वे सदा बीच का मार्ग अपनाते हैं। वे एक ओर तो बहुत अधिक धर्मी होने की ख्याति से, और दूसरी ओर ढीले या अधर्मी होने की ख्याति से बचते हैं। सदियों से ऐसा रहा है कि कोई व्यक्ति कभी धर्मोन्मादी कहलाए बिना धर्म का एक सम्मानजनक अंगीकार बनाए रख सकता था। और स्तर अब भी इतना नीचा है कि सम्भवतः प्रोटेस्टेंट कलीसियाओं का बड़ा समूह इसी बीच की भूमि पर टिके रहने का प्रयत्न कर रहा है। वे दोनों ओर मित्र रखना चाहते हैं। उन्हें न तो एक ओर पतित और त्यागे हुए लोगों में गिना जाता है, और न दूसरी ओर धर्मोन्मादियों या कट्टरपंथियों में। वे “फ़ैशनेबल मसीही” हैं! उन्हें दो कारणों से फ़ैशनेबल मसीही कहा जा सकता है। एक यह कि उनकी धार्मिक शैली लोकप्रिय और फ़ैशनेबल है; और दूसरा यह कि वे साधारणतः संसार के फ़ैशनों के पीछे चलते हैं। धर्म में उनका लक्ष्य यह है कि ऐसा कुछ न करें जिससे संसार को घृणा हो। परमेश्वर चाहे कुछ भी माँगे, उन्होंने ठान लिया है कि वे इतने समझदार बने रहेंगे कि न तो अपने ऊपर संसार की निन्दा लाएँ, और न परमेश्वर के शत्रुओं को अप्रसन्न करें। स्पष्ट है कि वे परमेश्वर से अधिक मनुष्यों का आदर करते हैं। और यदि वे कभी ऐसी स्थिति में पड़ जाएँ कि उन्हें या तो ऐसा कुछ करना पड़े जिससे उनके मित्र और पड़ोसी अप्रसन्न हों, या परमेश्वर को अप्रसन्न करना पड़े, तो वे परमेश्वर को अप्रसन्न करेंगे। यदि जनमत परमेश्वर की आज्ञाओं से टकराता है, तो वे जनमत के आगे झुक जाएँगे।

10. वे परमेश्वर की सराहना पाने की अपेक्षा मनुष्यों की वाहवाही पाने के लिए अधिक कुछ करेंगे।

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