व्याख्यान 231 (253 में से)

तौभी मैं तुम से सच कहता हूँ, कि मेरा जाना तुम्हारे लिये अच्छा है, क्योंकि यदि मैं न जाऊँ, तो वह सहायक

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अध्याय 22: ईश्वरीय शिक्षा की आवश्यकता। तौभी मैं तुम से सच कहता हूँ, कि मेरा जाना तुम्हारे लिये अच्छा है, क्योंकि यदि मैं न जाऊँ, तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा; परन्तु यदि मैं जाऊँगा, तो उसे तुम्हारे पास भेज दूँगा। और वह आकर संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा; पाप के विषय में इसलिये कि वे मुझ पर विश्वास नहीं करते; और धार्मिकता के विषय में इसलिये कि मैं पिता के पास जाता हूँ, और तुम मुझे फिर न देखोगे; न्याय के विषय में इसलिये कि संसार का सरदार दोषी ठहराया गया है। मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा। यूहन्ना 16:7-13।

मनुष्यों के मनों को प्रकाशित करने और पवित्र करने के लिये ईश्वरीय प्रभाव की आवश्यकता का सिद्धान्त बाइबल में बहुत भरपूरी से सिखाया गया है, और खरे सिद्धान्त माननेवाली सब कलीसियाओं में, कम से कम एक मत के रूप में, साधारणतः माना जाता है। परन्तु वास्तविकता यह है कि मनुष्यजाति में सुसमाचार का प्रभावकारी ज्ञान बहुत ही कम दिखाई देता है; इतना कम कि उसका प्रभाव अपेक्षाकृत बहुत थोड़ा पड़ता है। पृथ्वी पर पवित्रता उत्पन्न करने में सुसमाचार के महान उद्देश्य अभी मुश्किल से पूरे होने आरम्भ हुए हैं। यह एक बड़ा प्रश्न है कि क्या सुसमाचार के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिये हमें ईश्वरीय प्रभाव की आवश्यकता है; और यदि आवश्यकता है, तो किस मात्रा में, और क्यों? यदि इस प्रश्न पर हमारे मन अस्थिर हैं, तो उन सब विषयों पर भी हम अस्थिर रहेंगे जिनका व्यावहारिक सम्बन्ध हमारे पवित्रीकरण से है।

आज रात इस विषय पर बोलते हुए, मैं निम्नलिखित क्रम अपनाना चाहता हूँ:

I. यह जाँचना कि मनुष्य की बुद्धि, ईश्वरीय प्रकाश की सहायता के बिना, धर्म की बातों को कहाँ तक समझने में समर्थ है।

II. यह दिखाना कि सुसमाचार का कोई भी प्रभावकारी ज्ञान प्राप्त करने की क्षमता के विषय में मनुष्य की बुद्धि किस बात में त्रुटिपूर्ण है।

III. कि जिस प्रकाश की आवश्यकता है, उसे केवल परमेश्वर का आत्मा ही दे सकता है।

IV. कि हर एक व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं के अनुसार आत्मा का प्रभाव पा सकता है।

V. वे कारण कि क्यों कोई व्यक्ति अपनी आवश्यकताओं की सीमा तक यह ईश्वरीय सहायता पाने से चूक जाता है।

VI. कि मनुष्य उस प्रकाश के लिये भी उत्तरदायी हैं जो उन्हें मिल सकता था, जितना कि उस प्रकाश के लिये जिसका वे वास्तव में आनन्द लेते हैं।

I. मैं यह जाँचूँगा कि मनुष्य की बुद्धि, ईश्वरीय प्रकाश की सहायता के बिना, धर्म की बातों को कहाँ तक ग्रहण करने में समर्थ है।

1. मनुष्य का मन धर्म के ऐतिहासिक तथ्यों को ठीक वैसे ही समझने में समर्थ है, जैसे वह किसी भी अन्य ऐतिहासिक तथ्य को समझता है।

2. वह सुसमाचार के सैद्धान्तिक कथनों को समझने में समर्थ है।

अर्थात्, वह उन अमूर्त बातों को समझ सकता है जो सुसमाचार का ढाँचा बनाती हैं; जैसे परमेश्वर का अस्तित्व और चरित्र, पवित्रशास्त्र का ईश्वरीय अधिकार और उसकी ईश्वर-प्रेरणा, और अन्य मूलभूत सिद्धान्त जो सुसमाचार की रूपरेखा बनाते हैं।

अर्थात्, वह उन्हें कथनों के रूप में समझ सकता है, और उस प्रमाण को देख सकता है जो उनके सत्य होने का समर्थन करता है, ठीक वैसे ही जैसे वह विज्ञान के किसी भी कथन को समझ सकता है।

उदाहरण के लिये, थोड़ा विस्तार में जाएँ तो—एक मनुष्य अपनी बुद्धि के द्वारा परमेश्वर की व्यवस्था को समझ सकता है। वह समझ सकता है कि वह उससे यह माँग करती है कि वह परमेश्वर और अन्य सब प्राणियों के प्रति सिद्ध प्रेम का अभ्यास करे। वह ऐसा करने के अपने दायित्व का आधार देख सकता है, क्योंकि वह एक नैतिक

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