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परिचितों के बीच, या जहाँ वे पहचाने जाते हैं, वहाँ होते हैं। परन्तु जब वे ऐसी जगह पहुँचते हैं जहाँ उन्हें कोई नहीं पहचानता, या जहाँ इससे सबके सामने अपमान न होगा, तो आप उन्हें सब्त के दिन यात्रा करते हुए पाएँगे।
जिन पापों की जनमत निन्दा करता है, उन सब से यह वर्ग दूर रहता है, परन्तु वे दूसरे काम करते हैं जो उतने ही बुरे हैं, पर जिन पर इस प्रकार भौंहें नहीं चढ़ाई जातीं। वे उन कर्तव्यों को पूरा करते हैं जिन्हें जनमत लागू करता है, परन्तु उन्हें नहीं जिन पर कम ज़ोर दिया जाता है। वे सब्त के दिन सार्वजनिक आराधना से अनुपस्थित नहीं रहेंगे, क्योंकि यदि वे ऐसा करें तो धर्म के लिए उनकी कोई भी साख बनी नहीं रह सकेगी। परन्तु वे उन बातों की उपेक्षा करते हैं जिनकी आज्ञा परमेश्वर के वचन में उतनी ही दृढ़ता से दी गई है।
जहाँ कोई व्यक्ति परमेश्वर की किसी आज्ञा को, यह जानते हुए कि वह परमेश्वर की आज्ञा है, आदतन तोड़ता है, वहाँ यह उतना ही निश्चित है जितना यह कि उसका प्राण जीवित है, कि जो आज्ञापालन वह करता हुआ दिखाई देता है, वह परमेश्वर के अधिकार के प्रति आदर से, या परमेश्वर के प्रति प्रेम से नहीं, बल्कि दूसरे उद्देश्यों से है। वास्तव में वह परमेश्वर की किसी भी आज्ञा का पालन नहीं करता। प्रेरित ने इस प्रश्न का निपटारा कर दिया है। वह कहता है, “जो कोई सारी व्यवस्था का पालन करता है परन्तु एक ही बात में चूक जाए, तो वह सब बातों में दोषी ठहरा;” अर्थात वह व्यवस्था के किसी एक भी नियम का सच्चाई से पालन नहीं करता। परमेश्वर की आज्ञाओं के पालन का अर्थ है हृदय की आज्ञाकारी दशा, और इसलिए ऐसा कुछ भी आज्ञापालन नहीं है जिसमें परमेश्वर के अधिकार के प्रति सर्वोपरि आदर न हो।
अब, यदि किसी मनुष्य का हृदय ठीक है, तो परमेश्वर जो कुछ भी आज्ञा देता है, उसे वह और किसी भी बात से अधिक महत्त्वपूर्ण समझता है। और यदि कोई मनुष्य किसी और बात को परमेश्वर के अधिकार से अधिक वज़नदार समझता है, तो वही उसकी मूर्ति है। जिस किसी वस्तु का हम सर्वोपरि आदर करते हैं, वही हमारा ईश्वर है; चाहे वह प्रतिष्ठा हो, या आराम, या धन, या सम्मान, या जो कुछ भी हो जिसका हम सर्वोपरि आदर करते हैं, वही हमारे हृदय का ईश्वर है। किसी मनुष्य का कारण चाहे जो भी हो, जिसके लिए वह किसी ऐसी बात की आदतन उपेक्षा करता है जिसे वह परमेश्वर की आज्ञा जानता है, या जिसे वह मसीह के राज्य को बढ़ाने के लिए आवश्यक देखता है, यह इस बात का पूर्ण प्रमाण है कि वह उसी कारण को सर्वोपरि मानता है।
उसकी किसी भी सेवा में ऐसा कुछ नहीं जो परमेश्वर को ग्रहणयोग्य हो। निश्चय जानिए, उसका सारा धर्म जनमत का धर्म है। यदि वह परमेश्वर की व्यवस्था द्वारा माँगी गई किसी बात की इसलिए उपेक्षा करता है कि वह उपेक्षा करते हुए भी निभ सकता है, और जनमत उसकी माँग नहीं करता; या यदि वह परमेश्वर की व्यवस्था से मेल न खानेवाले दूसरे काम केवल इसलिए करता है कि जनमत उनकी माँग करता है, तो यह सीधा-सा तथ्य है कि अपने सारे आचरण में वह जनमत की आज्ञा मानता है, न कि परमेश्वर की महिमा का आदर करता है।
प्रियो, आपकी क्या दशा है? क्या आप परमेश्वर की किसी माँग की आदतन इसलिए उपेक्षा करते हैं कि जनमत उसका समर्थन नहीं करता और उसे लागू नहीं करता? यदि आप धर्म का अंगीकार करनेवाले हैं, तो माना जा सकता है कि आप ऐसी किसी माँग की उपेक्षा नहीं करते जिस पर जनमत ज़ोर देता है। परन्तु दूसरी माँगों के विषय में आपकी क्या दशा है? क्या आप कुछ कर्तव्यों की आदतन उपेक्षा नहीं करते? क्या आप ऐसी कुछ प्रथाओं में नहीं जीते जो मनुष्यों के बीच सम्मानजनक हैं, पर जिन्हें आप परमेश्वर की व्यवस्था के विरुद्ध जानते हैं? यदि ऐसा है, तो यह इस बात का पूर्ण प्रमाण है कि आप परमेश्वर के न्याय से अधिक मनुष्यों की राय का आदर करते हैं। अपना नाम लिख लीजिए—कपटी।
4. धर्म का अंगीकार करनेवालों का यह वर्ग जब घर से दूर होता है, तो कुछ ऐसे पापों में पड़ने का आदी होता है जिन्हें वे घर पर नहीं करते।
