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यदि मनुष्य कालकोठरियों में बन्द कर दिए जाते, जहाँ उन्हें कार्य करने का कोई अवसर न होता, और न परिस्थितियों से प्रभावित होने की कोई सम्भावना होती, और न अपने हृदय की दशा को प्रगट करने का कोई मार्ग होता, तो वे अपने आप को न जानने के लिए इतने दोषी न ठहरते। परन्तु परमेश्वर ने उन्हें इस जीवन में उन परिस्थितियों में जान-बूझकर रखा है जिनमें वे हैं, जैसा उसने इस्राएलियों से कहा था, कि उनकी परीक्षा करे, और जान ले कि उनके मन में क्या क्या है, और कि वे उसकी आज्ञाओं का पालन करेंगे या नहीं। हमारे चारों ओर की बातें अवश्य हमारे मन पर कोई छाप डालती हैं, और हमें किसी न किसी रीति से अनुभव करने और कार्य करने के लिए प्रेरित करती हैं। और इससे आत्म-ज्ञान के अवसर मिलते हैं, जब हम देखते हैं कि ऐसी विविध परिस्थितियों में हम कैसा अनुभव करते हैं और किस प्रकार कार्य करने की ओर झुकते हैं।
4. अपने सच्चे चरित्र को परखने के लिए हम इस बात से और भी योग्य बनाए गए हैं कि हमारे पास उन्हें परखने के लिए एक सिद्ध नियम है।
परमेश्वर की व्यवस्था एक सच्चा मापदण्ड है जिसके द्वारा हम अपने चरित्र को परख सकते हैं। हम ठीक-ठीक जानते हैं कि वह क्या है, और इसलिए हमारे पास अपने आप को जाँचने के लिए एक अचूक और अपरिवर्तनीय नियम है। हम अपनी भावनाओं और कार्यों को इस नियम के सामने ला सकते हैं, और उनकी तुलना इस मापदण्ड से कर सकते हैं, और ठीक-ठीक जान सकते हैं कि परमेश्वर की दृष्टि में उनका सच्चा स्वरूप क्या है, क्योंकि परमेश्वर स्वयं उन्हें इसी मापदण्ड से परखता है।
5. हमारी परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि बेईमानी को छोड़ और कुछ भी हमें आत्म-धोखे में नहीं डाल सकता।
जो व्यक्ति आत्म-धोखे में पड़ा है, वह केवल लापरवाह और असावधान ही नहीं, वरन् निश्चित रूप से बेईमान है, नहीं तो वह अपने आप को धोखा न देता। वह अवश्य बहुत हद तक घमण्ड के कारण पक्षपाती और अपनी हठीली इच्छा के कारण अन्धा हो गया होगा, नहीं तो वह यह जाने बिना रह ही नहीं सकता था कि वह वैसा नहीं है जैसा होने का वह अंगीकार करता है। जो परिस्थितियाँ उसके मन की क्रियाओं को जगाती हैं, वे इतनी अधिक और इतनी विविध हैं, कि जो धोखा खाता है वह जान-बूझकर ओढ़ा हुआ अन्धापन ही होगा। यदि उन्हें कार्य करने का कभी कोई अवसर न मिलता, या यदि परिस्थितियाँ उनकी भावनाओं को न जगातीं, तो वे अनजान रह सकते थे। जिस व्यक्ति ने कभी कोई भिखारी न देखा हो, वह शायद यह न बता सके कि भिखारियों के प्रति उसकी सच्ची भावनाएँ क्या हैं।
परन्तु उसे ऐसे स्थान पर रख दीजिए जहाँ वह प्रतिदिन भिखारियों से मिलता है, और यदि वह न जाने कि किसी भिखारी के प्रति उसके हृदय का स्वभाव कैसा है, तो वह अवश्य जान-बूझकर अन्धा या बेईमान है।
IV. मैं इस कर्तव्य को पूरा करने की रीति के विषय में कुछ बातों का उल्लेख करूँगा।
1. यह प्रमाण के अपने आप हमारे पास आने की प्रतीक्षा करने से नहीं होता।
बहुत-से लोग निष्क्रिय भाव से इस प्रतीक्षा में बैठे प्रतीत होते हैं कि प्रमाण उनके पास आए, जिससे यह निर्णय हो कि वे मसीही हैं या नहीं। वे ऐसे लगते हैं मानो कुछ विशेष भावनाओं के अपने पास आने की प्रतीक्षा करते रहे हों। शायद वे इसके विषय में प्रार्थना करते हैं; शायद वे बहुत आग्रहपूर्वक प्रार्थना करते हैं, और फिर उन भावनाओं के आने की प्रतीक्षा करते हैं जो उन्हें अपनी अच्छी दशा का सन्तोषजनक प्रमाण देंगी।
बहुत बार वे धर्म में तब तक कुछ भी नहीं करते जब तक उन्हें यह प्रमाण न मिल जाए, और वे बैठे रहते हैं, और प्रतीक्षा करते रहते हैं, और प्रतीक्षा करते रहते हैं, इस व्यर्थ आशा में कि परमेश्वर का आत्मा कभी न कभी आकर उन्हें इस दलदल से उठा लेगा, जबकि वे इसी प्रकार निष्क्रिय और सुस्त पड़े रहते हैं। वे न्याय के दिन तक प्रतीक्षा करते रह सकते हैं और इस रीति से उसे कभी नहीं पाएँगे।
