व्याख्यान 237 (253 में से)

बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से माँगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है;

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बुद्धि की घटी हो, तो परमेश्वर से माँगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है; और उस को दी जाएगी।” यदि यह सच है कि परमेश्वर ने ये असीमित प्रतिज्ञाएँ की हैं, कि जो भी मनुष्य उससे माँगेंगे, वे जितना ईश्वरीय प्रकाश माँगेंगे उतना पा सकते हैं, तो यह सच है कि सब मनुष्य उतना ईश्वरीय प्रकाश पा सकते हैं जितने की उन्हें आवश्यकता है।

V. मैं वे कारण दिखाऊँगा कि क्यों कुछ लोगों के पास उतना ईश्वरीय प्रकाश नहीं होता जितने की उन्हें आवश्यकता है।

1. वे उसे उस रीति से या उस मात्रा में नहीं माँगते जिसमें उन्हें उसकी आवश्यकता है।

2. वे बुरी इच्छा से, या स्वार्थी उद्देश्यों से माँगते हैं।

प्रेरित याकूब कहता है, “तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिये कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग विलास में उड़ा दो।” जब किसी व्यक्ति के माँगने का उद्देश्य स्वार्थी होता है, या परमेश्वर की महिमा करने की इच्छा के सिवाय कोई और कारण होता है, तो उसे ईश्वरीय प्रकाश पाने की आशा नहीं रखनी चाहिए। यदि पवित्र आत्मा माँगने में उसका उद्देश्य यह है कि वह धर्म में सदा प्रसन्न रहे, या कि वह पवित्रशास्त्र में बहुत बुद्धिमान हो जाए, या उसे एक प्रतिष्ठित मसीही समझा जाए, या उसके अनुभव की चर्चा असाधारण के रूप में की जाए, या कोई अन्य स्वार्थी दृष्टिकोण, तो यह एक अच्छा कारण है कि उसे वह भी न मिले जो वह माँगता है।

3. जो वे माँगते हैं, उसे प्राप्त करने के लिये वे उचित साधनों का प्रयोग नहीं करते।

मान लीजिए कि कोई व्यक्ति अपनी बाइबल की उपेक्षा करता है, और फिर भी परमेश्वर से माँगता है कि वह उसे धर्म की बातों का ज्ञान दे: यह परमेश्वर की परीक्षा करना है। परमेश्वर जिस रीति से ज्ञान देता है, वह बाइबल, और शिक्षा के अन्य ठहराए हुए साधनों के द्वारा है। यदि कोई व्यक्ति इन साधनों का, जब वे उसके वश में हों, प्रयोग नहीं करेगा, तो वह चाहे कितनी भी प्रार्थना करे, उसे ईश्वरीय शिक्षा की आशा नहीं रखनी चाहिए। “सो विश्वास सुनने से, और सुनना परमेश्वर के वचन से होता है।”

जिनके पास ये साधन हैं, और जिनके पास नहीं हैं, उनकी दशाओं के बीच एक महत्वपूर्ण अन्तर पर ध्यान देना चाहिए। मेरा मानना है कि कोई व्यक्ति साधनों के अभाव की किसी भी परिस्थिति में सुसमाचार सीख सकता है, और जितने प्रकाश की उसे आवश्यकता है, वह सब पा सकता है। जैसे यदि वह किसी निर्जन द्वीप पर हो, तो वह परमेश्वर के आत्मा से सीधा प्रकाश पा सकता है। और इसी प्रकार वह किसी भी अन्य परिस्थिति में पा सकता है, जहाँ वह शिक्षा के किसी भी साधन तक किसी प्रकार पहुँच ही न सके। पिछले कुछ वर्षों में इस प्रकार की कुछ बहुत ही उल्लेखनीय घटनाएँ हुई हैं। मैं एक घटना को जानता हूँ, जिसे मैं उस समय आश्चर्यकर्म समझता था, और इसी कारण मैंने उसका उल्लेख बहुत कम किया है, यह अनुभव करते हुए कि कलीसिया भी उसे ग्रहण करने के लिये तैयार नहीं थी।

जब मैं सुसमाचार-प्रचारक था, तो मैंने एक बार एक ऐसे इलाके में जागृति के समय परिश्रम किया, जहाँ बहुत से जर्मन लोग रहते थे।

उन्हें बहुत कम शिक्षा मिली थी, और उनमें से बहुत से पढ़ नहीं सकते थे। परन्तु जब उनके बीच सुसमाचार का प्रचार किया गया, तो परमेश्वर का आत्मा उण्डेला गया, और एक अत्यन्त सामर्थी जागृति हुई। कटनी के बीच, यदि किसी स्थान पर कोई सभा ठहराई जाती, तो सारा इलाका इकट्ठा हो जाता, और घर को भर देता, और प्रचारक के होंठों से निकलनेवाले हर शब्द पर टकटकी लगाए रहता, जबकि वह उनके मनों को सुसमाचार के सत्य से परिचित कराने का प्रयत्न करता। एक गरीब

जर्मन स्त्री ने, जो स्वभाव से बुद्धिमान थी, परन्तु पढ़ नहीं सकती थी, इन सभाओं में से एक में अपना अनुभव सुनाते हुए, यह घटना बताई, जिसकी पुष्टि उसके पड़ोसियों ने की। बहुत से

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