व्याख्यान 11 (253 में से)

आपने इतना धन कमा लिया? जब आपने उसकी सेवा में प्रवेश करने का अंगीकार किया, तब क्या परमेश्वर ने आपसे कहा था,

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आपने इतना धन कमा लिया? जब आपने उसकी सेवा में प्रवेश करने का अंगीकार किया, तब क्या परमेश्वर ने आपसे कहा था कि इतने वर्षों तक कड़ा परिश्रम करो, और फिर तुम्हें सदा की छुट्टी मिल सकती है? क्या उसने प्रतिज्ञा की थी कि उसके बाद वह आपको अपने समय और अपनी प्रतिभाओं का पूरा-पूरा उपयोग करने से छूट दे देगा, और आपको अपने शेष दिन आराम से जीने देगा? यदि आपके विचार इसी धारणा पर लगे हैं, तो मैं आपसे कहता हूँ, आप परमेश्वर की नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ और आलस्य की सेवा कर रहे हैं।

10. वे लोग अपने देवताओं की सेवा कर रहे हैं जो भलाई करने के लिए उन वस्तुओं से, जो अनावश्यक या हानिकारक तक हैं, अपने आप को रोकने के बदले अपनी भूख-लालसाओं को तृप्त करना अधिक पसन्द करते हैं।

आप ऐसे लोगों को पाते हैं जो उन वस्तुओं से बहुत प्रेम करते हैं जिनसे उनका कोई भला नहीं होता, और कुछ तो ऐसी वस्तु के लिए भी एक बनावटी लालसा पैदा कर लेते हैं जो स्पष्ट रूप से घृणित है, और वे उसके पीछे भागेंगे, और कोई भी तर्क उन्हें भलाई करने के लिए उसे छोड़ने पर राज़ी नहीं कर पाएगा। क्या ऐसे लोग परमेश्वर की सेवा में लीन हैं? निश्चय ही नहीं। क्या वे परमेश्वर के राज्य के लिए अपने प्राणों का बलिदान करेंगे? अरे, आप तो उनसे तम्बाकू का एक टुकड़ा तक नहीं छुड़वा सकते! एक ऐसी पत्ती जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक और समाज के लिए घृणित है; वे उसे नहीं छोड़ सकते, चाहे उससे किसी प्राण को मृत्यु से बचाना ही क्यों न हो!

कौन नहीं देखता कि ऐसे लोगों में स्वार्थ प्रबल है? यह स्वार्थ की आश्चर्यजनक शक्ति को दिखाता है। आप प्रायः स्वार्थ की शक्ति को बड़ी बातों की अपेक्षा ऐसी ही किसी छोटी सी बात में अधिक प्रकट होते देखते हैं। मनुष्य के मन की वास्तविक दशा इतनी स्पष्टता से उभर आती है कि आत्म-तृप्ति उसके जीवन का नियम है, और वह इतना प्रबल है कि एक तुच्छ सी बात में भी उन महान हितों के लिए स्थान नहीं छोड़ता, जिनके लिए उसे अपना प्राण तक दे देने को तैयार रहना चाहिए।

11. जो लोग अपने स्वार्थपूर्ण हितों की दुहाई से सबसे शीघ्र काम करने को प्रेरित होते हैं, वे दिखाते हैं कि वे अपने देवताओं की सेवा कर रहे हैं।

आप देखते हैं कि ऐसे मनुष्य को कौन सी प्रेरणा प्रभावित करती है। मान लीजिए मैं चाहता हूँ कि वह एक कलीसिया-भवन बनाने के लिए चन्दा लिखवाए, तो मुझे किस बात पर जोर देना पड़ेगा? अरे, मुझे यह दिखाना पड़ेगा कि इससे उसकी सम्पत्ति का मूल्य कैसे बढ़ेगा, या उसके दल को कैसे बढ़ावा मिलेगा, या किसी और प्रकार से उसके स्वार्थ की तृप्ति कैसे होगी। यदि वह नाश होते प्राणों को बचाने और मसीह के राज्य को आगे बढ़ाने की इच्छा की अपेक्षा इन प्रेरणाओं से अधिक उत्तेजित होता है, तो आप देखते हैं कि उसने प्रभु की सेवा के लिए अपने आप को कभी सौंपा ही नहीं। वह अब भी अपनी ही सेवा कर रहा है। वह उन सब परोपकारी सिद्धान्तों की अपेक्षा, जिन पर सारा धर्म टिका है, अपने स्वार्थपूर्ण हितों से अधिक प्रभावित होता है। परमेश्वर के सच्चे सेवक का चरित्र इसके ठीक विपरीत होता है।

दो सेवकों का उदाहरण लीजिए, एक अपने स्वामी के हितों के प्रति समर्पित है, और दूसरे को अपना वेतन पक्का करने के अतिरिक्त न कोई विवेक है और न कोई चिन्ता। एक के पास जाइए, तो वह सब व्यक्तिगत विचारों को पीछे छोड़ देता है, और तन-मन से उस उद्देश्य को पूरा करने में जुट जाता है। दूसरा तब तक कुछ नहीं करेगा जब तक आप कोई स्वार्थपूर्ण प्रेरणा उसके सामने न रखें; जब तक आप यह न कहें, “ऐसा करो, तो मैं तुम्हारा वेतन बढ़ा दूँगा या तुम्हें कोई काम-धन्धा शुरू करवा दूँगा,” या ऐसा ही कुछ। क्या इन दोनों सेवकों में मूलभूत अन्तर नहीं है? क्या यह उस बात का उदाहरण नहीं जो हमारी कलीसियाओं में वास्तव में होती है? भलाई करने की कोई ऐसी योजना प्रस्तावित कीजिए जिसमें कुछ खर्च न हो, तो वे सब उसके पक्ष में हो जाएँगे।

परन्तु कोई ऐसी योजना प्रस्तावित कीजिए जो उनके व्यक्तिगत हित को प्रभावित करनेवाली हो, जिसमें धन खर्च हो, या व्यस्त मौसम में

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