व्याख्यान 159 (253 में से)

यह जानकर कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, पर केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा धर्मी ठहरता है, हम ने आप भी विश्वास किया

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अध्याय 16: विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना। “यह जानकर कि मनुष्य व्यवस्था के कामों से नहीं, पर केवल यीशु मसीह पर विश्वास करने के द्वारा धर्मी ठहरता है, हम ने आप भी मसीह यीशु पर विश्वास किया, कि हम व्यवस्था के कामों से नहीं पर मसीह पर विश्वास करने से धर्मी ठहरें; इसलिए कि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी न ठहरेगा।” गलातियों 2:16।

यही अन्तिम विचार रोमियों के तीसरे अध्याय में भी इन्हीं शब्दों में व्यक्त किया गया है। जैसा कि मैंने पिछले सप्ताह घोषित किया था, इस व्याख्यान का विषय है, विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना। इस विषय पर विचार करते हुए मैं जिस क्रम का पालन करना चाहता हूँ, वह यह है:

I. यह दिखाना कि व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहराया जाना, अर्थात् वैधानिक रूप से धर्मी ठहराया जाना, क्या है। II. यह दिखाना कि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी नहीं ठहर सकता। III. यह दिखाना कि सुसमाचार के अनुसार धर्मी ठहराया जाना क्या है। IV. यह दिखाना कि सुसमाचार के अनुसार धर्मी ठहराए जाने का प्रभाव क्या है, अर्थात् वह धर्मी ठहराए गए व्यक्ति को किस दशा में ले आता है। V.

यह दिखाना कि सुसमाचार के अनुसार धर्मी ठहराया जाना विश्वास के द्वारा है। VI. उन कुछ प्रश्नों का उत्तर देना जो इस विषय पर बहुत से लोगों के मन में उठते हैं।

I. मुझे यह दिखाना है कि वैधानिक रूप से धर्मी ठहराया जाना क्या है।

1. अपने सामान्य कानूनी अर्थ में इसका अर्थ है, निर्दोष। इस अर्थ में किसी व्यक्ति को धर्मी ठहराना यह घोषित करना है कि वह व्यवस्था के किसी भी उल्लंघन का दोषी नहीं है। यह इस बात की पुष्टि करना है कि उसने कोई अपराध नहीं किया है। यह उसे निर्दोष घोषित करना है।

2. अधिक तकनीकी अर्थ में, यह किसी अपराध के आरोप के उत्तर में दी जानेवाली पैरवी का एक रूप है, जिसमें आरोपी व्यक्ति घटना को तो स्वीकार कर लेता है, परन्तु एक ऐसा कारण (बचाव) प्रस्तुत करता है जिसके आधार पर वह दावा करता है कि उसे वैसा करने का अधिकार था जैसा उसने किया, या कि वह दोष के योग्य नहीं है। इस प्रकार, यदि किसी व्यक्ति पर हत्या का आरोप है, तो औचित्य की पैरवी यह तो स्वीकार करती है कि उसने उस मनुष्य को मारा, परन्तु यह कहती है कि या तो यह आत्मरक्षा में किया गया और उसे उसे मारने का अधिकार था, या यह किसी अनिवार्य दुर्घटना से हुआ और वह उसे रोक नहीं सकता था। दोनों ही दशाओं में औचित्य की पैरवी घटना को तो स्वीकार करती है, परन्तु किसी पर्याप्त कारण के आधार पर दोष से इनकार करती है।

II. मुझे यह दिखाना है कि व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी न ठहरेगा। और यह बात धर्मी ठहराए जाने के दोनों में से किसी भी रूप के अन्तर्गत सत्य है।

1. धर्मी ठहराए जाने के पहले, अर्थात् सामान्य रूप के अन्तर्गत। इस दशा में प्रमाण देने का भार आरोप लगानेवाले पर होता है, जिसे लगाए गए आरोपों के तथ्यों को प्रमाणित करना होता है। और इस दशा में उसे केवल यह प्रमाणित करने की आवश्यकता है कि एक बार अपराध किया गया है। यदि यह एक बार प्रमाणित हो जाए, तो वह व्यक्ति दोषी है।

इस रीति से वह व्यवस्था के द्वारा धर्मी नहीं ठहराया जा सकता। वह दोषी पाया जाता है। उसके लिए यह दलील देना किसी काम का नहीं कि उसने हानि से अधिक भलाई की है, या कि उसने परमेश्वर की व्यवस्था को जितने समय तोड़ा है उससे अधिक समय उसका पालन किया है, वरन् उसे यह सिद्ध करना होगा कि उसने व्यवस्था की एक-एक मात्रा और एक-एक बिन्दु को पूरा किया है।

इस रीति से व्यवस्था के द्वारा कौन धर्मी ठहराया जा सकता है? कोई नहीं।

2. न ही धर्मी ठहराए जाने के दूसरे, अर्थात् तकनीकी रूप के अन्तर्गत। इस दशा में प्रमाण देने का भार उस पर होता है जो पैरवी करता है। जब वह औचित्य की पैरवी करता है, तो वह लगाए गए आरोप के तथ्य को स्वीकार कर लेता है, और इसलिए उसे अपना बचाव सिद्ध करना होगा, नहीं तो वह असफल होगा। यहाँ दो बातें ध्यान देने योग्य हैं। जो बात बचाव के रूप में प्रस्तुत की जाती है, वह सच होनी चाहिए, और वह एक अच्छा और पर्याप्त बचाव या औचित्य होना चाहिए, न कि कोई तुच्छ बहाना, या ऐसा बहाना जो मामले पर लागू ही न हो। यदि वह सच नहीं है, या यदि वह अपर्याप्त है, और विशेषकर यदि वह न्यायालय या शासन पर लांछन लगाता है, तो वह उसके अपराध को घोर रूप से और भी गम्भीर बना देता है। इस टिप्पणी का महत्त्व आप थोड़ी देर में देखेंगे।

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