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मात्र औपचारिकता की बात होती है जितना तब, जब बेचारा पोपपंथी पुरोहित अपनी माला के दाने गिनता है। ऐसा मनुष्य यदि परमेश्वर और मनुष्य का सच्चा मित्र होने की बातें करे, तो वह अपने आप को धोखा देता है।
9. ये लोग यह पूछना नहीं चाहते कि पापियों के मन-परिवर्तन के लिए उनसे कौन-कौन सी बातें करना “अपेक्षित” है।
जब उनके सामने कोई ऐसी बात रखी जाती है जिससे पापियों के मन-परिवर्तन में सफलता की आशा हो, तो वे इस बात की प्रतीक्षा नहीं करते कि ऐसा न करने पर दण्ड और जुर्माने की चेतावनी के साथ उन्हें उसे करने की आज्ञा दी जाए। वे केवल यह प्रमाण चाहते हैं कि यह बात उस उद्देश्य को आगे बढ़ानेवाली है जिस पर उनका मन लगा हुआ है, और वे अपने सारे प्राण से उसमें लग जाएँगे। उनके सामने हर समय यह प्रश्न नहीं रहता कि “मुझे स्पष्ट रूप से क्या करने की आज्ञा दी गई है?” बल्कि यह कि “प्राणों के उद्धार के लिए, और संसार के परमेश्वर की ओर फिरने के लिए, मैं किस रीति से सबसे अधिक कर सकता हूँ?” मिशन के काम में, या सब्त-पाठशालाओं में, या किसी भी ऐसे उद्यम में लगने से पहले जिससे प्राणों के बचने की आशा हो, वे बाइबल में किसी स्पष्ट आज्ञा की प्रतीक्षा नहीं करते; बल्कि वे हर एक भले वचन और काम के लिए तैयार रहते हैं।
10. ऐसे मसीहियों की एक और विशेषता यह है कि वे दूसरों की भलाई करने के लिए अपने आप का इन्कार करने को तत्पर रहते हैं।
परमेश्वर ने सारे विश्व में ‘देने’ का सिद्धान्त स्थापित किया है। प्राकृतिक जगत में भी नदी, समुद्र, बादल—सब देते हैं। प्रकृति और अनुग्रह के सारे राज्य में ऐसा ही है। यह फैलकर बाँटनेवाला सिद्धान्त हर जगह माना जाता है। यही मसीह की सच्ची आत्मा है। उसने अपने आप को प्रसन्न करना नहीं चाहा, बल्कि दूसरों की भलाई करना चाहा। उसने दूसरों की भलाई करने के लिए अपने आप का इन्कार करने में अपना सर्वोच्च आनन्द पाया। इस वर्ग के लोगों के साथ भी ऐसा ही है—जब ऐसा करके वे दूसरों की अधिक भलाई कर सकते हैं, तो वे सुख-भोगों और आरामों से, यहाँ तक कि आवश्यक वस्तुओं से भी, अपने आप को वंचित करने के लिए सदा तैयार रहते हैं।
11. वे भलाई करने के लिए लगातार नए साधन और नए तरीके खोजते रहते हैं।
भलाई करने की उनकी निरन्तर इच्छा से यही अपेक्षित है। जो सफल नहीं होता उससे सन्तुष्ट रहने के बजाय, वे अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए लगातार नए उपाय और साधन खोजते रहते हैं। वे उन लोगों के समान नहीं हैं जो उसे करके सन्तुष्ट हो जाते हैं जिसे वे अपना कर्तव्य कहते हैं। जहाँ कोई व्यक्ति मुख्यतः अपने ही उद्धार का लक्ष्य रखता है, वह सोच सकता है कि यदि वह अपना कर्तव्य कर दे तो वह उत्तरदायित्व से मुक्त हो गया, और इसलिए वह सन्तुष्ट रहता है—वह सोचता है कि जो कुछ परमेश्वर ने उससे माँगा था उसे करके वह ईश्वरीय क्रोध से बच गया है और अपने लिए स्वर्ग प्राप्त कर लिया है, और पापी बचें या नाश हों, इसमें वह कुछ नहीं कर सकता। परन्तु दूसरे वर्ग के साथ ऐसा नहीं है; उनका उद्देश्य स्वर्ग पाना और क्रोध से बचना इतना नहीं है, बल्कि उनका प्रमुख उद्देश्य प्राणों को बचाना और परमेश्वर का आदर करना है। और यदि यह उद्देश्य आगे नहीं बढ़ता, तो वे पीड़ा में रहते हैं। ऐसा मनुष्य वही है जिसका प्राण हर समय उदारता की युक्तियाँ निकालता रहता है, और नई-नई बातें आज़माता है, और यदि एक विफल हो जाए तो दूसरी और फिर तीसरी आज़माता है, और तब तक चैन नहीं लेता जब तक उसे कोई ऐसी बात न मिल जाए जो प्राणों के उद्धार में सफल हो।
12. जब वे कलीसिया को सोती हुई और पापियों के उद्धार के लिए कुछ न करती हुई देखते हैं, तो वे सदा बड़ा शोक प्रकट करते हैं।
वे जानते हैं कि जब तक कलीसिया सो रही है, तब तक पापियों के उद्धार के लिए कुछ भी उल्लेखनीय करना कितना कठिन—बल्कि असम्भव—है। किसी ऐसी कलीसिया में जाइए जहाँ अधिकांश लोग
