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साधनों के उपयोग की उपेक्षा करते हैं। जिन्हें अवसर प्राप्त है, उनके लिये “विश्वास सुनने से, और सुनना परमेश्वर के वचन से होता है।” यदि कोई मनुष्य अपनी पहुँच के भीतर के साधनों से दूर रहता है, तो वह किसी और रीति से प्रकाश की आशा नहीं रख सकता।
जबकि, यदि वह साधनों के प्रयोग से वंचित है, तो जैसे परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं में सच्चा है, हमें विश्वास करना चाहिए कि वह बिना साधनों के, जितनी उसे आवश्यकता हो उस सीमा तक, प्रकाशित किया जा सकता है।
4. बहुत से लोगों को परमेश्वर के आत्मा से वह प्रकाश, जिसकी उन्हें आवश्यकता है, न मिलने का एक और कारण यह है कि वे बहुत सी रीतियों से आत्मा को शोकित करते हैं।
वे ऐसी रीति से जीवन बिताते हैं कि पवित्र आत्मा शोकित, या अप्रसन्न होता है, जिससे वह अपने स्वभाव से संगत रहते हुए उन्हें अपना प्रकाश देनेवाला अनुग्रह प्रदान नहीं कर सकता।
5. एक और कारण यह है कि वे शिक्षाओं और साधनों पर ऐसे निर्भर रहते हैं मानो वे ईश्वरीय प्रभाव के बिना ही प्रभावकारी हों।
कितने ही लोग उन शिक्षाओं पर भरोसा करते हैं जो वे पादरियों से, या टीकाओं से, या पुस्तकों से, या अपनी खोज करने की शक्तियों से पाते हैं, और यह अनुभव नहीं करते कि ये सब बातें, परमेश्वर के आत्मा के बिना, केवल मार डालेंगी, परन्तु कभी जीवित नहीं कर सकतीं—केवल दण्ड के योग्य ठहरा सकती हैं, परन्तु कभी उद्धार नहीं कर सकतीं। ऐसा लगता है मानो सारी कलीसिया इस बात में भूल में है; ईश्वरीय ज्ञान के लिये साधनों पर निर्भर रहती है, और यह अनुभव नहीं करती कि परमेश्वर के आत्मा के बिना कोई भी साधन प्रभावकारी नहीं। ओह! यदि कलीसिया यह अनुभव करती—यदि वे सचमुच अनुभव करते कि सृष्टि के सारे साधन पवित्र आत्मा की शिक्षा के बिना व्यर्थ हैं, तो वे कैसी प्रार्थना करते, और अपने हाथ शुद्ध करते, और अपने हृदयों को दीन करते, जब तक कि सहायक उतरकर उन्हें धर्म की वे सब बातें न सिखा देता जिन्हें जानने की उन्हें आवश्यकता है।
6. आत्म-विश्वास एक और कारण है कि ईश्वरीय प्रकाश का इतना कम अनुभव किया जाता है।
जब तक धर्म का अंगीकार करनेवाले मसीही धर्म की बातें सीखने के लिये विद्वत्ता पर, या आलोचना-शास्त्र पर, या अपनी स्वाभाविक चतुराई पर भरोसा रखते हैं, तब तक, निश्चय जानिए, उन्हें परमेश्वर के आत्मा के प्रकाश का अधिक आनन्द मिलने की सम्भावना नहीं है।
VI. मुझे यह दिखाना है कि ईश्वरीय प्रकाश का जो भाग मनुष्यों को मिल सकता था, उसके लिये वे उत्तरदायी हैं।
यह एक सार्वभौमिक सत्य है, और सारी मनुष्यजाति इसे स्वीकार करती है, कि मनुष्य उस प्रकाश के लिये भी, जो उसे मिल सकता था, ठीक उतना ही उत्तरदायी है, जितना उस प्रकाश के लिये जो उसके पास वास्तव में है। सामान्य कानून, जो सामान्य बुद्धि की आवाज़ है, इसे एक सिद्धान्त-वाक्य के रूप में अपनाता है कि कानून तोड़नेवाले किसी भी मनुष्य को कानून से अनजान होने के कारण छोड़ा नहीं जाना चाहिए, क्योंकि सब इस बात के लिये बाध्य माने जाते हैं कि वे जानें कि कानून क्या है। आपके बच्चों के साथ भी ऐसा ही है; जिस दशा में वे आपकी इच्छा जान सकते थे, यदि वे अपराध करें, तो आप उन्हें उतना ही अधिक दोषी समझते हैं। धर्म में भी ऐसा ही है: जहाँ मनुष्यों के पास शिक्षा के बाहरी साधन और पवित्र आत्मा की भीतरी शिक्षाएँ, दोनों पूरी रीति से उनकी पहुँच के भीतर हैं, यदि वे अनजाने में पाप करते हैं, तो न केवल उस आधार पर उनके पास कोई बहाना नहीं, परन्तु उनकी अज्ञानता स्वयं एक अपराध है, और उनके दोष को और भारी बना देती है। और सब मनुष्य स्पष्ट रूप से उस सारे ज्ञान के न रखने के लिये निरुत्तर हैं, जो उनके सिद्ध और तुरन्त पवित्रीकरण के लिये प्रभावकारी होता।
