व्याख्यान 138 (253 में से)

कुछ लोगों ने यह समझा है कि सच्चे समर्पण में पापी होने को तैयार रहने का विचार

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कुछ लोगों ने यह समझा है कि सच्चे समर्पण में परमेश्वर की महिमा के लिये पापी होने को तैयार रहने का विचार सम्मिलित है। परन्तु यह भूल है। पापी होने को तैयार रहना स्वयं ही मन की एक पापमय दशा है। और परमेश्वर की महिमा के लिये कुछ भी करने को तैयार रहने का अर्थ है पापी न होने का चुनाव करना।

परमेश्वर की महिमा के लिये पापी होने का विचार ही बेतुका है।

3. यह दण्ड पाने को तैयार रहने में नहीं है।

यदि हम अभी नरक में होते, तो सच्चे समर्पण की माँग यह होती कि हम दण्ड पाने को तैयार रहें। क्योंकि तब यह निश्चित होता कि परमेश्वर की इच्छा यही है कि हमें दण्ड मिले।

इसी प्रकार, यदि हम ऐसे संसार में होते जहाँ पापियों के छुटकारे का कोई प्रबन्ध नहीं किया गया था, और जहाँ इस कारण हमारा दण्ड अटल होता, तो दण्ड पाने को तैयार रहना हमारा कर्तव्य होता। यदि किसी मनुष्य ने हत्या की है, और सार्वजनिक हित को सुरक्षित रखने का उसे फाँसी दिए जाने के सिवा कोई दूसरा उपाय नहीं है, तो सार्वजनिक भलाई के लिये फाँसी पाने को तैयार रहना उसका कर्तव्य है।

परन्तु यदि कोई दूसरा ऐसा उपाय होता जिससे हत्यारा सार्वजनिक हित की पूरी भरपाई कर सकता, तो फाँसी पाने को तैयार रहना उसका कर्तव्य न होता। इसी प्रकार यदि वह ऐसे संसार में होता जो केवल व्यवस्था के अधीन हो, जहाँ उद्धार की कोई योजना न हो, और पापियों को क्षमा करते हुए शासन की स्थिरता को सुरक्षित रखने का कोई उपाय न हो, तो दण्ड पाने को तैयार रहना हर मनुष्य का कर्तव्य होता।

परन्तु इस संसार में जैसी स्थिति है, उसमें सच्चे समर्पण का अर्थ दण्ड पाने को तैयार रहना नहीं है।

क्योंकि हम जानते हैं कि परमेश्वर की यह इच्छा नहीं है कि सब दण्ड पाएँ, वरन् इसके विपरीत, हम जानते हैं कि उसकी इच्छा यह है कि जितने सच्चे मन से पश्चाताप करते और परमेश्वर के आधीन हो जाते हैं, वे सब उद्धार पाएँ।

II. मुझे यह दिखाना है कि सच्चा समर्पण क्या है।

1. यह परमेश्वर के विधान के सब व्यवहारों और प्रबन्धों में पूर्ण सहमति रखने में है; चाहे उनका सम्बन्ध हमसे हो, या दूसरों से, या सारे विश्व से। कुछ लोग समझते हैं कि वे सैद्धान्तिक रूप से परमेश्वर के विधानमय शासन में सहमत हैं। परन्तु फिर भी, यदि आप उनसे बातचीत करें तो आप देखेंगे कि वे बहुत सी बातों में परमेश्वर के प्रबन्धों में दोष निकालेंगे। वे अचम्भा करते हैं कि परमेश्वर ने आदम को पाप क्यों करने दिया? या उसने पाप को विश्व में प्रवेश ही क्यों करने दिया? या उसने यह या वह क्यों किया? या उसने यह या वह वस्तु ऐसी या वैसी क्यों बनाई? इन सब बातों में, यह मान लेने पर भी कि हम कोई भी सन्तोषजनक कारण न बता सकें, सच्चे समर्पण का अर्थ यह है कि जो कुछ भी उसने होने दिया या किया है, उसमें पूर्ण सहमति हो; और यह अनुभव हो कि जहाँ तक उसके विधान का सम्बन्ध है, सब कुछ ठीक है।

2. सच्चे समर्पण में परमेश्वर की नैतिक व्यवस्था की आज्ञा में सहमति सम्मिलित है। परमेश्वर की नैतिक व्यवस्था की सामान्य आज्ञा यह है, “तू प्रभु अपने परमेश्वर से अपने सारे मन से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी शक्ति से प्रेम रखना, और तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखना।” कदाचित् कोई कहेगा, “मैं इस आज्ञा में सहमत हूँ, मैं अनुभव करता हूँ कि यह ठीक है, और मुझे इस व्यवस्था पर कोई आपत्ति नहीं है।” यहाँ मैं चाहता हूँ कि आप परमेश्वर की व्यवस्था के स्वभावगत अनुमोदन और उसके प्रति वास्तविक समर्पण के बीच सावधानी से अन्तर करें। ऐसा कोई मन नहीं है जो स्वाभाविक रूप से, और उचित क्या है इसकी अपनी सामान्य समझ से, इस व्यवस्था का अनुमोदन न करता हो। नरक में ऐसा एक भी दुष्टात्मा नहीं है जो इसका अनुमोदन न करता हो। परमेश्वर ने मन की बनावट ऐसी की है कि नैतिक कर्ता होते हुए उसकी व्यवस्था का अनुमोदन न करना असम्भव है। परन्तु यह वह सहमति नहीं है जिसकी मैं बात कर रहा हूँ। एक व्यक्ति में यह अनुमोदन इतनी अधिक मात्रा में हो सकता है कि वह इससे आनन्दित भी हो, और फिर भी उसमें

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