व्याख्यान 44 (253 में से)

7. धर्म का अंगीकार करनेवाले मसीहियों का यह वर्ग सदा व्याकुल रहता है जब तक कि वे पापियों के

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7. धर्म का अंगीकार करनेवाले मसीहियों का यह वर्ग सदा व्याकुल रहता है जब तक कि वे पापियों के मन-परिवर्तन का काम चलता हुआ न देखें।

यदि कोई पापी मन-परिवर्तन न करे, तो वे इसे कलीसिया की शोचनीय दशा कहते हैं। और चाहे जो कुछ भी सच हो, चाहे मंडली कितनी ही धनी क्यों न हो जाए, चाहे उनका पादरी कितना ही लोकप्रिय क्यों न हो, या कितने ही लोग उसे सुनने क्यों न आएँ, उनके लालायित हृदय तब तक बेचैन रहते हैं जब तक वे मन-परिवर्तन का काम सचमुच चलता हुआ न देखें। वे देखते हैं कि इसके बिना बाकी सब कुछ व्यर्थ है—हाँ, कि जब तक पापी मन न फिराएँ, तब तक अनुग्रह के साधन भी भलाई से अधिक हानि कर रहे हैं।

ऐसे अंगीकार करनेवाले उन लोगों के लिए बड़ी परेशानी होते हैं जो दूसरे अभिप्रायों से धार्मिक हैं, और इसलिए चाहते हैं कि सब कुछ शान्त रहे और सब कुछ “पुराने अच्छे ढर्रे” पर नियमित रूप से चलता रहे। उन्हें अक्सर “कलीसिया की बेचैन आत्माएँ” कहा जाता है। और इस पर ध्यान दीजिए! यदि किसी कलीसिया में ऐसी कुछ आत्माएँ हों, तो पादरी को तब तक बेचैन किया जाएगा जब तक उसका प्रचार ऐसा न हो कि पापियों का मन फिराए। आप कभी-कभी सुनते हैं कि ऐसे लोग कलीसिया को डाँटते हैं, और इतने ठंडे और सांसारिक ढंग से जीने के लिए उससे आग्रह-भरी विनती उँडेलते हैं, और कलीसिया उत्तर देती है, “अजी, हम तो काफ़ी अच्छा कर रहे हैं, क्या आप नहीं देखते कि हम कैसे... यह मूर्खता है, यह तो केवल इसलिए है कि आप सदा बेचैन रहते हैं।” जबकि वास्तव में उनके हृदय दुखी हैं और उनके प्राण वेदना में हैं, क्योंकि पापी मन नहीं फिराते और प्राण नरक की ओर धँसते चले जा रहे हैं।

8. जब वे प्रार्थना की आत्मा प्रकट करते हैं, तो आप उन्हें अपने लिए नहीं, बल्कि पापियों के लिए प्रार्थना करते देखेंगे।

यदि आप लोगों की प्रार्थनाओं के सामान्य स्वर को जानते हैं, तो वह दिखा देगा कि उनकी भावनाओं का ज्वार किस ओर बहता है। यदि कोई मनुष्य धर्म में मुख्यतः अपने आप को बचाने की इच्छा से प्रेरित है, तो आप उसे मुख्यतः अपने ही लिए प्रार्थना करते सुनेंगे कि उसके पाप क्षमा हों और वह परमेश्वर के आत्मा का बहुत “आनन्द” ले, इत्यादि। परन्तु यदि वह सचमुच परमेश्वर और मनुष्य का मित्र है, तो आप पाएँगे कि उसकी प्रार्थनाओं का बोझ पापियों के उद्धार में परमेश्वर की महिमा के लिए है; और वह प्रार्थना में कभी इतना भरपूर और सामर्थी नहीं होता जितना तब, जब वह अपने प्रिय विषय—पापियों के मन-परिवर्तन—पर आ जाता है। उस प्रार्थना-सभा में जाइए जहाँ ऐसे मसीही प्रार्थना करते हैं, और उन्हें अपने ही हितों के अखरोट के छिलके में बन्द, अपनी सारी प्रार्थना अपने ही ऊपर खर्च करते, और अन्त में मसीह के राज्य के विषय में केवल एक आडम्बर-भरा वाक्य जोड़कर समाप्त करते देखने के बजाय, आप उन्हें पापियों के उद्धार के लिए प्रार्थना में अपने प्राण उँडेलते सुनेंगे। मेरा विश्वास है कि ऐसे मसीहियों के उदाहरण हुए हैं जो पापियों के उद्धार की अपनी अभिलाषाओं में इतने डूबे हुए थे कि कई सप्ताहों तक उन्होंने अपने उद्धार के लिए प्रार्थना तक नहीं की।

या यदि वे अपने लिए प्रार्थना करते भी हैं, तो इसलिए कि वे परमेश्वर के आत्मा से ढँके जाएँ, ताकि वे बाहर जाकर प्राणों को आग में से खींच निकालने में परमेश्वर के द्वारा सामर्थी हों।

आप जो यहाँ हैं, बता सकते हैं कि आपकी प्रार्थनाओं का क्या हाल है, कि आप सबसे अधिक अपने लिए अनुभव करते और प्रार्थना करते हैं या पापियों के लिए। यदि आप पापियों के लिए प्रार्थना की आत्मा के विषय में कुछ नहीं जानते, तो आप परमेश्वर और मनुष्य के सच्चे मित्र नहीं हैं। क्या! जब पापी आपकी बगल से नरक की ओर जा रहे हैं, तब उनके लिए अनुभव करनेवाला हृदय नहीं! परमेश्वर के पुत्र के साथ कोई सहानुभूति नहीं, जिसने पापियों को बचाने के लिए अपना प्राण दे दिया!

धर्म के ऐसे सब अंगीकारों को दूर कीजिए। “यदि किसी में मसीह का आत्मा नहीं तो वह उसका जन नहीं।” मुझसे यह मत कहिए कि लोग सचमुच भक्त हैं, जब उनकी प्रार्थनाएँ ऐसे भिनभिनाते हुए नीरस ढंग से दोहराई जाती हैं, जो उतना ही

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