व्याख्यान 80 (253 में से)

रूपों के पीछे चलते देखते हैं। वे देखते हैं, और कहते हैं, “उनके अंगीकार का मूल्य ही क्या है, जब

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रूपों के पीछे चलते देखते हैं। वे देखते हैं, और कहते हैं, “उनके अंगीकार का मूल्य ही क्या है, जब वे किसी के भी बराबर फ़ैशनों के पीछे चलते हैं?” या, “फ़ैशनों के पीछे चलना निश्चय ही उचित है, क्योंकि देखो, मसीही होने का अंगीकार करनेवाले भी हमारे जितना ही ऐसा करते हैं।”

15. मसीही होने का अंगीकार करनेवालों से फ़ैशन में संसार के सदृश न बनने की माँग किए जाने का एक और कारण वह बड़ा प्रभाव है जो फ़ैशन की उनकी उपेक्षा संसार पर डालती।

यदि मसीही होने का अंगीकार करनेवाले इन बातों के प्रति अपनी तुच्छता की भावना प्रकट करें, और न उनके पीछे चलने का दिखावा करें, न उनकी परवाह करें, तो इससे संसार कितना लज्जित होगा, और संसार को यह निश्चय हो जाएगा कि वे किसी दूसरे लक्ष्य के लिए, परमेश्वर के लिए और अनन्तकाल के लिए, जी रहे हैं! यह कितना अकाट्य होगा!

हमारे धर्म के पक्ष में यह कैसी प्रबल गवाही होगी! संन्यासियों के बहुत-से धर्मसंघों द्वारा संसार के दिखावटी त्याग ने भी निस्सन्देह उनके धर्म के विरोध को दबाने, और संसार में उसे प्रचलन और प्रभाव दिलाने में किसी भी और बात से अधिक काम किया है। अब मान लीजिए कि यह सब हार्दिक और सच्चा होता, और मसीही चरित्र में जो कुछ सुसंगत और मनोहर है, और संसार को पाप से पवित्रता की ओर फेरने के परिश्रम में जो कुछ उत्साही और साहसी है, उस सब के साथ जुड़ा होता। तो इसका कैसा प्रभाव होता! यह संसार के कानों में कैसे गर्जन उँडेलता, ताकि वे जागकर परमेश्वर के पीछे चलें!

तीसरा: राजनीति में।

मैं दिखाऊँगा कि मसीही होने का अंगीकार करनेवालों से राजनीति में संसार के सदृश न बनने की माँग क्यों की गई है।

1. क्योंकि संसार की राजनीति पूर्णतया बेईमान है।

कौन इसे नहीं जानता? कौन नहीं जानता कि हर दल की घोषित नीति यही है कि अपने उम्मीदवार के दोषों को, और विरोधी उम्मीदवार के अच्छे गुणों को ढाँप दे? और क्या यह बेईमानी नहीं है? हर दल अपने उम्मीदवार को सिद्धता का नमूना बनाकर प्रस्तुत करता है, और फिर उचित या अनुचित, किसी भी उपाय से उसे पद पर बिठाने का लक्ष्य रखता है। कोई भी मनुष्य जो किसी दल से इस प्रकार बँधा हुआ है कि वह चाहे जो करे, वह उसके साथ चलेगा, ईमानदार मनुष्य नहीं हो सकता। और क्या कोई मसीही ऐसा कर सकता है, और फिर भी अपना विवेक निर्दोष रख सकता है?

2. राजनीति में संसार के सदृश बनना परमेश्वर की परीक्षा करना है।

राजनीति में संसार के साथ मिल जाने से मसीही इस बात के दोषी होते हैं कि वे अपने ही मत से अपने ऊपर ऐसे शासक ठहराते हैं जो न परमेश्वर का भय मानते हैं, न उससे प्रेम रखते हैं, और जो परमेश्वर की व्यवस्था की खुली अवहेलना करते हैं, सब्त (विश्रामदिन) को तोड़ते हैं, और जुआ खेलते हैं, और व्यभिचार करते हैं, और द्वन्द्वयुद्ध लड़ते हैं, और अपवित्र शपथें खाते हैं, और अपनी इच्छा से कानूनों को लागू किए बिना छोड़ देते हैं, और जिन्हें अपने देश के भले या बुरे की कोई चिन्ता नहीं होती, जब तक वे अपने पद पर बने रह सकें। मैं कहता हूँ कि मसीही यह करते हैं। “क्योंकि यह स्पष्ट है कि जहाँ दल बँटे हुए हैं, जैसे इस देश में हैं, वहाँ किसी भी चुनाव में पलड़ा पलटने के लिए पर्याप्त मसीही हैं।”

अब मसीही यह स्थान ग्रहण करें कि वे किसी भी पद के लिए किसी बेईमान मनुष्य को, या सब्त तोड़नेवाले को, या जुआरी को, या वेश्यागामी को, या द्वन्द्वयुद्ध लड़नेवाले को मत नहीं देंगे, तो कोई भी दल

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