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और जब तक आप उद्धार देनेवाला विश्वास न करें, तब तक वे क्षमा नहीं किए जा सकते। इसलिए उद्धार देनेवाला विश्वास अवश्य ही किसी और बात पर विश्वास करना होगा।
(2) न ही उद्धार देनेवाला विश्वास इस बात पर विश्वास करने में है कि आप किसी न किसी दिन उद्धार पाएँगे। जब तक आप धर्मी ठहरानेवाला या उद्धार देनेवाला विश्वास न कर लें, तब तक आपको यह विश्वास करने का कोई अधिकार नहीं कि आप उद्धार पाएँगे।
(3) परन्तु धर्मी ठहरानेवाला विश्वास मसीह के प्रायश्चित पर विश्वास करने में है, अर्थात उस गवाही पर विश्वास करने में जो परमेश्वर ने अपने पुत्र के विषय में दी है।
इस परिभाषा की सच्चाई पर कुछ लोगों ने सन्देह किया है; और मैं स्वीकार करता हूँ कि इस विषय पर मेरे अपने विचार में परिवर्तन हुआ है। कहा जाता है कि अब्राहम ने परमेश्वर पर विश्वास किया, और यह उसके लिए धार्मिकता गिना गया। परन्तु अब्राहम ने किस बात पर विश्वास किया? उसने विश्वास किया कि उसे एक पुत्र होगा। क्या बस इतना ही? कदापि नहीं। उसके विश्वास में वह महान आशीष भी सम्मिलित थी जो उस घटना पर निर्भर थी, अर्थात यह कि मसीहा, जगत का उद्धारकर्ता, उसी के वंश से उत्पन्न होगा।
अब्राहम के साथ बाँधी गई वाचा का यही महान विषय था, और यह उसके एक पुत्र होने पर निर्भर था।
निस्सन्देह, अब्राहम के विश्वास में “सब जातियों का मनभावना” सम्मिलित था, और वह मसीह पर विश्वास था। प्रेरित पौलुस ने गलातियों के तीसरे अध्याय में इसे पूरे विस्तार से दिखाया है कि वाचा का सार यह था, “तुझ में सब जातियाँ आशीष पाएँगी।” पद 16 में वह कहता है, “निदान, प्रतिज्ञाएँ अब्राहम को, और उसके वंश को दी गईं: वह यह नहीं कहता, कि वंशों को; जैसे बहुतों के विषय में कहा, पर जैसे एक के विषय में कि तेरे वंश को: और वह मसीह है।”
कहा जाता है कि इब्रानियों के 11वें अध्याय में सब पवित्र लोगों के विषय में यह नहीं कहा गया कि उन्होंने मसीह पर विश्वास किया। परन्तु यदि आप ध्यान से जाँचें, तो आप पाएँगे कि सब उदाहरणों में मसीह पर विश्वास या तो उस बात में सम्मिलित है जिस पर उन्होंने विश्वास किया, या स्पष्ट रूप से उसमें निहित है। हाबिल का उदाहरण लीजिए। “विश्वास ही से हाबिल ने कैन से उत्तम बलिदान परमेश्वर के लिए चढ़ाया; और उसी के द्वारा उसके धर्मी होने की गवाही भी दी गई: क्योंकि परमेश्वर ने उसकी भेंटों के विषय में गवाही दी; और उसी के द्वारा वह मरने पर भी अब तक बातें करता है।” उसका बलिदान उत्तम क्यों था? क्योंकि अपनी भेड़-बकरियों के पहिलौठों को चढ़ाकर उसने प्रायश्चित की आवश्यकता को, और इस बात को मान लिया कि “बिना लहू बहाए क्षमा नहीं होती।”
कैन एक घमण्डी नास्तिक था, और उसने भूमि की उपज को परमेश्वर के विधान से मिली आशीषों के लिए केवल एक धन्यवाद-भेंट के रूप में चढ़ाया, बिना यह स्वीकार किए कि वह एक पापी है, और उसे प्रायश्चित की आवश्यकता है, जिसके आधार पर वह क्षमा की आशा कर सके।
कुछ लोग समझते हैं कि कोई व्यक्ति यीशु मसीह के ईश्वरत्व और प्रायश्चित का इनकार करते हुए भी धर्मी ठहरानेवाला विश्वास कर सकता है। मैं इसका इनकार करता हूँ। प्रकाशन का सम्पूर्ण सार और तत्व, एक बिन्दु पर मिलनेवाली किरणों की भाँति, यीशु मसीह पर, उसके ईश्वरत्व और प्रायश्चित पर केन्द्रित है। उद्धार के विषय में भविष्यद्वक्ता और पुराने नियम के अन्य लेखक जो कुछ कहते हैं, वह सब उसी तक पहुँचता है। पुराना
नियम और नया नियम, सारे प्रतिरूप और छायाएँ, उसी की ओर संकेत करते हैं। पुराने नियम के सारे पवित्र लोग उसी पर विश्वास के द्वारा उद्धार पाए। उनका विश्वास आनेवाले मसीहा पर जाकर टिकता था, जैसे नए नियम के पवित्र लोगों का विश्वास आ चुके मसीहा पर टिकता था। 1 कुरिन्थियों के 15वें अध्याय में प्रेरित पौलुस दिखाता है कि वह इस शिक्षा को कौन-सा स्थान देगा: “इसी कारण मैं ने सबसे पहले तुम्हें वही बात पहुँचा दी, जो मुझे पहुँची थी, कि पवित्रशास्त्र के वचन के अनुसार मसीह हमारे पापों के लिए मर गया; और गाड़ा गया; और तीसरे दिन
