व्याख्यान 157 (253 में से)

VI. यहाँ कुछ लोग पूछेंगे, “क्या! क्या हमें अपने सुख का कुछ भी ध्यान नहीं रखना है, और यदि रखना है, तो

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VI. यहाँ कुछ लोग पूछेंगे, “क्या! क्या हमें अपने सुख का कुछ भी ध्यान नहीं रखना है, और यदि रखना है, तो हम यह कैसे निर्णय करें कि वह सर्वोपरि है या नहीं?” मैं ऐसा नहीं कहता। मैं कहता हूँ कि आप उसका ध्यान उसके सापेक्ष मूल्य के अनुसार रख सकते हैं। और अब मैं पूछता हूँ, क्या यहाँ कोई वास्तविक व्यावहारिक कठिनाई है? मैं आपकी अन्तःचेतना से अपील करता हूँ। यदि आप ईमानदार हैं, तो आप यह जाने बिना रह ही नहीं सकते कि वह क्या है जिसे आप सर्वोपरि मानते हैं। क्या ये हित, एक ओर आपका अपना हित, और दूसरी ओर परमेश्वर की महिमा और विश्व की भलाई, आपके मन में इतने बराबर तुले हुए हैं कि आप बता ही नहीं सकते कि आप किसे अधिक पसन्द करते हैं? यह असम्भव है! यदि आपको इस बात का उतना ही बोध नहीं कि आप अपने हित से बढ़कर परमेश्वर की महिमा को पसन्द करते हैं, जितना इस बात का बोध है कि आपका अस्तित्व है, तो आप निश्चित मान लीजिए कि आप पूरी तरह गलत हैं।

VII. आप देखते हैं कि धर्म का अंगीकार करनेवाले इतने सारे लोगों का आनन्द उनके प्रमाणों पर क्यों निर्भर रहता है। ये लोग हर समय प्रमाणों की खोज में लगे रहते हैं; और ठीक उसी अनुपात में जिसमें वे प्रमाण घटते-बढ़ते हैं, उनके आनन्द भी घटते-बढ़ते रहते हैं। अब ध्यान दीजिए! यदि वे सचमुच परमेश्वर की महिमा और मनुष्यजाति की भलाई का ध्यान रखते, तो उनका आनन्द उनके प्रमाणों पर निर्भर न होता। जो लोग पूरी तरह स्वार्थी हैं, वे धर्म में बहुत आनन्द ले सकते हैं, परन्तु वह केवल आगे की आशा से होता है। स्वर्ग जाने का विचार उन्हें अच्छा लगता है। परन्तु जो अपने आप से बाहर निकलते हैं, और पूरी तरह परोपकारी हैं, उनके हृदयों में अभी, इसी समय, स्वर्ग होता है।

VIII. आप यहाँ देखते हैं कि आप में से वे सब, जिन्हें आशा पाने से पहले धर्म में कोई शान्ति और आनन्द नहीं मिला था, धोखे में हैं। शायद मैं आपके अनुभव की रूपरेखा दे सकता हूँ। आप जागृत हुए, और नरक जाने के भय से व्याकुल हुए, जैसा कि आपके लिए व्याकुल होने का कारण भी था। कुछ समय बाद, शायद जब आप प्रार्थना में लगे थे, या जब कोई व्यक्ति आपसे बातचीत कर रहा था, आपकी व्याकुलता जाती रही। आपने सोचा कि आपके पाप क्षमा हो गए। आनन्द की एक किरण आपके मन में कौंध गई, और उसने आपके हृदय को गरमाकर एक दमक से भर दिया, जिसे आपने प्रमाण मान लिया, और इससे आपका आनन्द और भी बढ़ गया। एक सच्चे मसीही का अनुभव इससे कितना भिन्न होता है! उसकी शान्ति उसकी आशा पर निर्भर नहीं करती; वरन् सच्चा समर्पण और परोपकार, उसकी आशा से स्वतंत्र होकर, शान्ति और आनन्द उत्पन्न करते हैं।

कल्पना कीजिए कि एक मनुष्य बन्दीगृह में है, जिसे अगले दिन फाँसी पर लटकाए जाने का दण्ड सुनाया गया है। वह बड़ी व्याकुलता में है, अपनी कोठरी में टहल रहा है, और उस दिन की बाट जोह रहा है। कुछ समय बाद, एक सन्देशवाहक क्षमा-पत्र लेकर आता है। वह उस कागज़ को झपट लेता है, उसे अपनी सलाखों में से आनेवाले मन्द प्रकाश की ओर करता है, ‘क्षमा’ शब्द पढ़ता है, और भावावेश से लगभग मूर्छित हो जाता है, और आनन्द से उछल पड़ता है। वह समझता है कि वह कागज़ असली है। अब मान लीजिए कि पता चलता है कि वह कागज़ जाली है। अचानक उसका सारा आनन्द जाता रहता है। ठीक ऐसा ही धोखा खाए हुए व्यक्ति के साथ होता है। वह नरक जाने से डरता था, और स्वाभाविक है कि यदि वह विश्वास कर ले कि उसे क्षमा मिल गई है, तो वह आनन्दित होता है। यदि शैतान उससे ऐसा कह दे, और वह उसका विश्वास कर ले, तो जब तक वह विश्वास बना रहता है, उसका आनन्द उतना ही बड़ा होगा मानो वह सच हो। सच्चा मसीही आनन्द प्रमाण पर निर्भर नहीं करता। वह ऐसे भरोसे के साथ अपने आप को परमेश्वर के हाथों में सौंप देता है, और वही कार्य उसे शान्ति देता है। परमेश्वर के साथ उसका एक भयानक संघर्ष चल रहा था, परन्तु एकाएक वह उस विवाद को छोड़ देता है, और कहता है, “परमेश्वर उचित ही करेगा, परमेश्वर की इच्छा पूरी हो।” तब वह प्रार्थना करने लगता है, वह दीन हो जाता है, वह परमेश्वर के सामने पिघल जाता है, और वही कार्य उसे मधुर, शान्त और स्वर्गीय आनन्द देता है। शायद उसने आशा के विषय में सोचा भी नहीं। शायद वह घण्टों तक, या

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