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परमेश्वर आपसे पश्चाताप करवाने के लिए जिन प्रभावों का प्रयोग करता है, उनके सिवा किन्हीं और प्रभावों का प्रयोग करने की अपेक्षा वह आपके पश्चाताप न करने की दशा में बने रहने, और आपके दण्डित होने को भी अधिक उचित समझ सकता है।
परन्तु इससे आपका यह निष्कर्ष निकालना कि वह नहीं चाहता कि आप उन प्रभावों के आगे झुकें जिनका वह प्रयोग करता है, कितना विचित्र तर्क है! मान लीजिए आपका सेवक ऐसा तर्क करे और कहे, “मैं विश्वास नहीं करता कि मेरा स्वामी सचमुच चाहता है कि मैं उसकी आज्ञा मानूँ, क्योंकि वह मुझे काम में लगाए रखने के लिए दिन भर मेरे पास खड़ा नहीं रहता।” क्या यह उचित निष्कर्ष है? बहुत सम्भव है कि स्वामी का समय इतना मूल्यवान हो कि उसका ऐसा करना उसके व्यापार के लिए उस सेवक के दिन भर खाली खड़े रहने से भी बड़ी हानि हो।
परमेश्वर के शासन में भी ऐसा ही है। यदि परमेश्वर अपने शासन की सारी शक्ति किसी एक व्यक्ति पर लगा दे, तो वह उस व्यक्ति को बचा तो सकता है, परन्तु उसी समय इससे उसके शासन में इतनी गम्भीर गड़बड़ी हो जाएगी कि यह उस व्यक्ति के नरक में जाने से कहीं अधिक बड़ी बुराई होगी। इसी प्रकार एक मसीही के विषय में भी, परमेश्वर ने उसे पवित्रीकरण के सब साधन दे दिए हैं, और उससे सिद्ध होने की माँग की है; और अब वह पलटकर कहता है, “परमेश्वर वास्तव में मेरा सिद्ध होना नहीं चाहता; यदि चाहता, तो वह मुझे सिद्ध बना देता।”
यह ठीक वही तर्क है जो पश्चाताप न करनेवाला पापी देता है, और दोनों में से किसी भी स्थिति में यह रत्ती भर भी बेहतर नहीं है।
सीधी सच्चाई यह है कि परमेश्वर दोनों से यही चाहता है कि जिन परिस्थितियों में वे रखे गए हैं, उनमें वे ठीक वही करें जिसकी वह उन्हें आज्ञा देता है।
2. वे स्वयं इसकी आशा नहीं रखते।
कलीसिया का अधिकांश भाग वास्तव में यह आशा ही नहीं रखता कि वह जितना भक्त अभी है, उससे अधिक भक्त बनेगा।
3. अधिकतर समय वे सिद्ध पवित्रीकरण की इच्छा तक नहीं रखते।
4. वे धार्मिकता के लिए अपनी भूख और प्यास से ही सन्तुष्ट हैं, और तृप्त किए जाने की आशा नहीं रखते।
यहाँ मैं यह कह दूँ कि पवित्रता के लिए भूख और प्यास स्वयं पवित्रता नहीं है। किसी वस्तु की इच्छा स्वयं वह वांछित वस्तु नहीं है। यदि वे पवित्रता के लिए भूखे और प्यासे हैं, तो उन्हें
परमेश्वर को तब तक चैन नहीं लेने देना चाहिए जब तक वह अपनी उस प्रतिज्ञा को पूरा न करे कि वे पवित्रता से तृप्त किए जाएँगे, अर्थात् पूर्णतः पवित्र बना दिए जाएँगे।
5. वे सुसमाचार के महान उद्देश्य को अनदेखा करते हैं।
बहुत लम्बे समय से कलीसिया यह सोचने की अभ्यस्त रही है कि सुसमाचार का महान उद्देश्य मनुष्यों को पाप के दण्ड से बचाना है, जबकि उसका वास्तविक उद्देश्य और लक्ष्य मनुष्यों को पाप से छुड़ाना है। परन्तु मसीहियों ने दूसरा ही आधार अपना लिया है, और वे इसके सिवा और कुछ सोचते ही नहीं कि उन्हें पाप में चलते रहना है, और उनकी सारी आशा बस इतनी है कि उन्हें क्षमा मिल जाए, और जब वे मरें तो स्वर्ग में पवित्र बना दिए जाएँ। ओह, यदि वे केवल यह समझ लेते कि सुसमाचार का पूरा ढाँचा इसी उद्देश्य से बनाया गया है कि वह पाप की शक्ति को तोड़ दे, और पृथ्वी पर ही मनुष्यों को परमेश्वर की सारी भरपूरी से भर दे, तो कितनी शीघ्र सारे संसार में परमेश्वर के लोगों के हृदयों में प्रेम की एक अटल ज्वाला धधक उठती!
6. प्रतिज्ञाओं को समझा नहीं जाता, और विश्वास के द्वारा उन्हें अपना नहीं बनाया जाता।
यदि कलीसिया बाइबल पढ़े, और उसमें दी गई हर प्रतिज्ञा को थाम ले, तो वह उन्हें बहुत ही बड़ी और बहुमूल्य पाएगी। परन्तु अभी तो कलीसिया अपना उत्तराधिकार खो रही है, और इस बात से अनजान बनी हुई है कि वह कितनी बड़ी आशीषें पा सकती है। यदि आज रात मेरे पास समय होता तो मैं आपको
