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वे ऐसा करना चाहते हैं, अपने आप को तृप्त करने के लिए, और वे अपने सन्देहों को दूर करवाने की अपेक्षा गलत काम करने का जोखिम उठाना अधिक पसन्द करते हैं। इसका कारण यह है कि उनमें परमेश्वर के प्रति इतना कम प्रेम है, परमेश्वर के आदर की इतनी कम चिन्ता है।
6. अपनी प्रार्थनाओं में यह न कहिए, “हे प्रभु, यदि मैं ने इस बात में पाप किया है, तो हे प्रभु, मेरा वह पाप क्षमा कर।”
यदि आपने वह काम किया है जिसके उचित होने पर आपको सन्देह था, तो आपने पाप किया है, चाहे वह काम स्वयं में ठीक हो या गलत। और आपको पश्चाताप करना होगा, और क्षमा माँगनी होगी।
और अब, मैं आप सब से जो यहाँ उपस्थित हैं, पूछता हूँ, क्या आपको निश्चय हो गया है कि जिस काम के उचित होने पर आपको सन्देह है उसे करना पाप है? यदि हाँ, तो मुझे आपसे एक प्रश्न और पूछना है। क्या आप इस समय से हर उस बात को छोड़ देंगे जिसके उचित होने पर आपको सन्देह है? हर मनोरंजन, हर भोग-विलास, हर प्रथा, हर व्यवसाय? क्या आप ऐसा करेंगे, या आप यीशु मसीह के गम्भीर न्याय-आसन के सामने दोषी ठहराए हुए खड़े होंगे? यदि आप इन बातों को नहीं छोड़ेंगे, तो आप दिखाते हैं कि आप पश्चाताप न करनेवाले पापी हैं, और परमेश्वर की आज्ञा मानने का आपका कोई इरादा ही नहीं है, और यदि आप पश्चाताप नहीं करते तो आप अपने सिर पर परमेश्वर का दण्ड और क्रोध, सदा के लिए, ले आते हैं।
