यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।
इस काम में लगी है, संदेहों से बहुत परेशान कर सके। उनका ध्यान उस पर नहीं, बल्कि किसी और बात पर लगा होता है, और वह उन पर दाँव नहीं चला सकता।
21. भलाई करने के लिए आत्म-त्याग की बढ़ती हुई माँगों पर वे बड़ी बेचैनी प्रगट करते हैं।
एक व्यक्ति ने कहा, “इस संयम-सुधार का अन्त कहाँ होगा? पहले तो वे केवल तेज़ शराब के विरुद्ध थे, और मैंने उसे छोड़ दिया, और उसके बिना मेरा काम भली-भाँति चलता रहा। फिर उन्होंने हमसे दाखरस छोड़ने को कहा; और अब वे हमसे हमारी चाय और कॉफ़ी और तम्बाकू छोड़ने को कह रहे हैं; यह कहाँ जाकर रुकेगा?” इस प्रकार के लोग इतना कुछ छोड़ने के लिए कहे जाने पर निरन्तर दुःखी रहते हैं। जो भलाई की जानी है वह उनके विचारों में आती ही नहीं, क्योंकि वे हर समय इसी बात पर मन लगाए रहते हैं कि उन्हें क्या-क्या छोड़ना पड़ेगा।
यह आसानी से देखा जा सकता है कि अंधकार के राज्य पर होनेवाले ये आक्रामक अभियान ऐसे लोगों को क्यों दुःखी करते हैं। उनका उद्देश्य कभी यह नहीं था कि इस संसार में से हर उस बात को खोज निकालें और दूर कर दें जो परमेश्वर का अनादर करती या मनुष्य को हानि पहुँचाती है। उन्होंने कभी इस दृढ़ निश्चय के साथ धर्म में प्रवेश नहीं किया कि जहाँ तक उनका बस चले, और ज्यों-ज्यों उन्हें यह निश्चय होता जाए कि कोई बात उन्हें या दूसरों को, प्राण या शरीर में, हानि पहुँचाती है, त्यों-त्यों वे ऐसी हर बात को पृथ्वी पर से साफ़ कर देंगे। और इसलिए वे उन लोगों के अभियानों से दुःखी होते हैं जो सचमुच हर बुराई को खोज निकालने और दूर करने में लगे हुए हैं।
ये लोग मिशनों, बाइबलों, ट्रैक्टों और ऐसी ही बातों के लिए देने की निरन्तर बढ़ती माँगों से चिढ़ते हैं। एक समय था जब कोई धनी व्यक्ति ऐसे कामों के लिए वर्ष में पच्चीस डॉलर देता था, तो समझा जाता था कि वह काफ़ी अच्छा कर रहा है। परन्तु अब चन्दों और दान के लिए इतनी माँगें होती हैं कि वे हर समय यातना में रहते हैं। “मुझे ये चन्दे पसन्द नहीं, मैं मंडली में चन्दा इकट्ठा किए जाने के विरुद्ध हूँ, मेरे विचार में इनसे हानि होती है।” इन प्रतिनिधियों से तो वे विशेष रूप से चिढ़े रहते हैं। “मैं नहीं जानता कि ये जो भिखारी घूमते फिरते हैं, इनका क्या किया जाए।” अपनी साख बनाए रखने के लिए, या कोई भी आशा रखने के लिए, उन्हें हर समय देते रहना पड़ता है, परन्तु वे इस बात से बहुत दुःखी रहते हैं, और नहीं जानते कि संसार किस ओर जा रहा है, बातें ऐसी विचित्र दशा में पहुँच गई हैं।
जैसे-जैसे आप कलीसिया में जीवन के सामान्य स्तर को ऊँचा उठाते हैं, धर्म का अंगीकार करनेवालों का यह वर्ग पाता है कि उन्हें भी ऊपर उठना पड़ेगा, कहीं ऐसा न हो कि उनकी आशाएँ डगमगा जाएँ। और धर्म का अंगीकार करनेवालों का सामान्य स्तर पहले ही इतना ऊँचा उठ चुका है कि मुझे कोई संदेह नहीं कि इस वर्ग के लोगों को अपनी आशा बनाए रखने के लिए, जिसे वे धर्म कहते हैं उसमें, अब बीस वर्ष पहले की तुलना में चार गुना अधिक खर्च करना पड़ता है। और यदि इतने सारे नए अभियान और नए तरीके हों, और संसार को बचाने के लिए इतना कुछ किया जाए, तो उनका क्या होगा? प्रभु उनकी सहायता करे, क्योंकि वे बड़े संकट में हैं!
22. जब उनसे भलाई करने के लिए आत्म-त्याग करने को कहा जाता है, तो यह उनके लिए सुखद बात होने के बजाय उन्हें निरी पीड़ा देता है।
ऐसा व्यक्ति आत्म-त्याग का आनन्द लेने के विषय में कुछ नहीं जानता। वह नहीं समझ सकता कि आत्म-त्याग सुखद कैसे हो सकता है, और न यह कि कोई उसमें आनन्द कैसे ले सकता है, या दूसरों का भला करने के लिए अपने आप का इनकार करने में मन का आनन्द कैसे पा सकता है। वह सोचता है कि यह धर्म की एक ऐसी ऊँचाई है जिस तक वह नहीं पहुँचा है। फिर भी परमेश्वर और मनुष्य का सच्चा मित्र, जिसका मन पूरी तरह
