व्याख्यान 177 (253 में से)

जब तक मन केवल व्यवस्था की ओर ही देखता रहता है, तब तक वह केवल आशा और भय का ही प्रभाव अनुभव करता है,

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जब तक मन केवल व्यवस्था की ओर ही देखता रहता है, तब तक वह केवल आशा और भय का ही प्रभाव अनुभव करता है, और इससे पूरी तरह स्वार्थी प्रयत्न ही चलते रहते हैं। परन्तु विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना दासत्व की इस आत्मा को जड़ से मिटा देता है।

प्रेरित कहता है, “हमें दासत्व की आत्मा नहीं मिली, कि फिर भयभीत हों।” उद्धार की यह योजना परमेश्वर के प्रति प्रेम और कृतज्ञता उत्पन्न करती है, और प्राणों को पवित्रता की मिठास चखने की ओर ले जाती है।

2. यह मन को इस विवशता से भी छुटकारा देती है कि वह अपने ही उद्धार को अपना सर्वोच्च लक्ष्य बनाए।

सुसमाचार की उद्धार-योजना पर विश्वास करनेवाला यह पाता है कि उद्धार, पूरा और सम्पूर्ण, जिसमें पवित्रीकरण और अनन्त जीवन दोनों सम्मिलित हैं, पहले से ही तैयार है; और धर्म में एक फरीसी के जीवन की ओर, अर्थात् परिश्रम से भरे और थका डालनेवाले प्रयत्न के जीवन की ओर धकेले जाने के बदले, वह उसे एक सेंत-मेंत के दान के रूप में, केवल एक उपहार के रूप में ग्रहण करता है, और अब वह स्वतंत्र है कि निःस्वार्थ परोपकार का आचरण करे, और दूसरों के उद्धार के लिए जीए और परिश्रम करे, और अपने प्राण को बिना किसी संकोच के मसीह के हाथ में छोड़ दे।

3. यह तथ्य कि परमेश्वर ने उसके लिए उद्धार का प्रबन्ध किया है और उसे सेंत-मेंत दे दिया है, विश्वासी में दूसरों के लिए चिन्ता जगाने के योग्य है, जब वह उन्हें इस उद्धार के अभाव में मरते हुए देखता है, कि वे भी सत्य की पहचान तक पहुँचाए जाएँ और उद्धार पाएँ। ये प्रभाव हर प्रकार के स्वार्थी उद्देश्य से कितने दूर हैं! यह परमेश्वर को उस रूप में प्रकट नहीं करता जिसमें व्यवस्था उसे प्रकट करती है, अर्थात् एक ऐसे शत्रु के रूप में जिससे मेल हो ही नहीं सकता, वरन् एक दुःखी और अपमानित पिता के रूप में, जो मेल करने को तैयार है, हाँ, जो बहुत ही चाहता है कि उसकी प्रजा उससे मेल कर ले और जीवित रहे।

यह प्रेम उत्पन्न करने के योग्य है। यह परमेश्वर को ऐसा प्रकट करता है कि वह पापियों का अपने साथ मेल कराने के लिए सबसे बड़ा बलिदान कर रहा है; और यह किसी और उद्देश्य से नहीं, केवल उनके सुख के प्रति शुद्ध और निःस्वार्थ चिन्ता के कारण। इसे अपने ही परिवार में आज़माकर देखिए। व्यवस्था परमेश्वर को क्रोध से सुसज्जित, और पापी को बिना किसी आशा या सहायता के दण्ड देने पर दृढ़ ठहराए हुए दिखाती है। सुसमाचार उसे अपमानित तो दिखाता है, परन्तु फिर भी इतना उत्सुक कि वे उसके पास लौट आएँ, कि उसने अपनी भटकी हुई सन्तानों के प्रति शुद्ध निःस्वार्थ प्रेम के कारण सबसे बड़े बलिदान किए हैं जिनकी कल्पना की जा सकती है।

मैंने एक बार एक पिता को यह कहते सुना कि उसने अपने परिवार में परमेश्वर के शासन का अनुकरण करने का प्रयत्न किया था, और जब उसका बच्चा कोई गलत काम करता तो वह उसके साथ तर्क करता और उसे उसके दोष दिखाता; और जब वह पूरी तरह कायल हो गया, और निरुत्तर और दोषी ठहर गया, यहाँ तक कि उसके पास कहने को एक शब्द भी न रहा, तब पिता ने उससे पूछा, क्या तुम दण्ड पाने के योग्य हो? जी हाँ। मैं यह जानता हूँ, और अब यदि मैं तुम्हें छोड़ दूँ, तो दूसरे बच्चों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? ऐसा करने के बजाय, मैं दण्ड स्वयं अपने ऊपर ले लूँगा। तब उसने बेंत अपने ही ऊपर चलाया, और बच्चे के मन पर इसका अत्यन्त आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ा। उसने कभी भी कोई ऐसा उपाय नहीं आज़माया था जो मन को इतनी पूरी तरह वश में कर लेता हो। और मन के नियमों के अनुसार ऐसा ही होना अनिवार्य है। यह मन पर केवल नंगी व्यवस्था की अपेक्षा बिलकुल भिन्न रीति से प्रभाव डालता है।

4. यह मन को प्रभावों के एक बिलकुल नए समूह के अधीन ले आता है, और उसे स्वतंत्र छोड़ देता है कि वह पवित्रता के पक्ष के कारणों को तौले और उनके अनुसार निर्णय करे।

व्यवस्था के अधीन पापी के मन पर आशा और भय के उद्देश्यों को छोड़ और कोई उद्देश्य काम नहीं कर सकता।

परन्तु सुसमाचार के अधीन आशा और भय का प्रभाव एक ओर कर दिया जाता है, और विचारों का एक नया समूह प्रस्तुत किया जाता है, जिसके साथ परमेश्वर के सम्पूर्ण चरित्र का दर्शन होता है, उन सब आकर्षणों सहित जो उसके अधिकार में हैं।

यह परमेश्वर के विषय में ऐसे दृष्टिकोण देता है जो सबसे अधिक हृदय को तोड़नेवाले और पाप को वश में करनेवाले हैं। यह उसे इन्द्रियों के सामने

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