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अपुल्लोस की चर्चा, दृष्टान्त की रीति पर की है, इसलिये कि तुम हमारे द्वारा यह सीखो, कि लिखे हुए से आगे न बढ़ना, और एक के पक्ष में और दूसरे के विरोध में गर्व न करना।”
दूसरी टिप्पणी। प्रेरित यहाँ जिस भाषा का प्रयोग करता है, उसका बहुत सा भाग एक ऐसे पीछे हटनेवाले की दशा पर लागू होता है जिसके पास धर्म के बाहरी रूप को छोड़ और सब कुछ खो गया है। उसने अपना पहला प्रेम छोड़ दिया है, और वास्तव में व्यवस्था के उद्देश्यों के, अर्थात् आशा और भय के, प्रभाव के अधीन आ गया है, ठीक पश्चाताप न करनेवाले पापी के समान। यदि सचमुच कोई ऐसा पीछे हटनेवाला होता है जो पहले सचमुच नया विश्वासी बना था, तो वह उस समय उन्हीं उद्देश्यों से प्रेरित होता है जिनसे पापी होता है, और वही भाषा दोनों पर समान रूप से लागू हो सकती है। और इसलिए यह तथ्य कि हमारे सामने की कुछ भाषा उस मसीही पर लागू होती है जो पीछे हट गया है, यह बिलकुल प्रमाणित नहीं करता कि यहाँ वर्णित अनुभव मसीही अनुभव है, वरन् केवल यह कि पीछे हटनेवाला और पापी बहुत सी बातों में एक समान हैं। मैं कम से कम इतना कहने में संकोच नहीं करता: कि जिसे यह बोध था कि वह परमेश्वर के प्रति प्रेम से प्रेरित है, उसने कभी इस अध्याय को अपने ऊपर लागू करने की बात सोची भी नहीं होगी। यदि कोई परमेश्वर के प्रति प्रेम का आचरण नहीं कर रहा है, तो यह उसके चरित्र का वर्णन करता है; और चाहे वह पीछे हटनेवाला हो या पापी, बात एक ही है।
तीसरी टिप्पणी। यह माना जाता है कि प्रेरित द्वारा यहाँ प्रयोग किए गए कुछ वाक्यांश ऐसे विश्वासी की दशा का वर्णन करते हैं जो आदतन पीछे हटनेवाला नहीं है, परन्तु कुछ समय के लिए परीक्षा और वासना से पराजित हो जाता है, और अपने विषय में ऐसे बोलता है मानो वह पूरी तरह गलत हो। हमें बताया गया है कि मनुष्य तब परीक्षा में पड़ता है जब वह अपनी ही अभिलाषा से खिंचकर और फँसकर बहकाया जाता है। और उस दशा में, निःसन्देह, वह यहाँ ऐसे वाक्यांश पा सकता है जो उस प्रभाव के अधीन रहते हुए उसके अपने अनुभव का वर्णन करते हों। परन्तु इससे इस खण्ड के उद्देश्य के विषय में कुछ भी प्रमाणित नहीं होता, क्योंकि जब तक वह इस दशा में रहता है, तब तक वह उस हद तक एक विशेष प्रभाव के अधीन होता है, और पश्चाताप न करनेवाला पापी पूरे समय ठीक ऐसे ही प्रभाव के अधीन होता है। इसलिए वही भाषा बिना किसी असंगति के दोनों पर लागू हो सकती है।
परन्तु यद्यपि कुछ वाक्यांशों का यह विश्वसनीय-सा प्रतीत होनेवाला अर्थ लगाया जा सकता है, फिर भी पूरे खण्ड पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह मसीही अनुभव का चित्रण नहीं हो सकता। इसलिए मेरा अपना मत यह है कि प्रेरित का उद्देश्य यहाँ एक ऐसे पापी के अनुभव को प्रस्तुत करना था जो लापरवाह नहीं, वरन् प्रबल रूप से पाप का बोध पाए हुए है, और फिर भी जिसका मन-परिवर्तन नहीं हुआ है। कारण ये हैं:
1. क्योंकि प्रेरित यहाँ स्पष्ट रूप से किसी व्यक्ति के आदतन चरित्र का वर्णन कर रहा है; और यह व्यक्ति पूरी तरह शरीर की प्रभुता के अधीन है। सम्पूर्ण रूप से यह ऐसे व्यक्ति का वर्णन नहीं है जो वर्तमान परीक्षा की शक्ति के अधीन अपने सामान्य चरित्र के विपरीत आचरण कर रहा हो, वरन् उसका सामान्य चरित्र ही ऐसा है। यह ऐसा व्यक्ति है जो व्यवस्था का समर्थन करने के बावजूद लगातार पाप में गिरता रहता है।
2. अपने तर्क के उदाहरण के रूप में किसी मसीही का अनुभव बताना उसके उद्देश्य से पूरी तरह असम्बद्ध होता। उस समय इसकी आवश्यकता नहीं थी। वह शारीरिक मन पर परमेश्वर की व्यवस्था के प्रभाव के सम्बन्ध में उस व्यवस्था को निर्दोष ठहराने का परिश्रम कर रहा था। एक पिछले अध्याय में उसने यह तथ्य बताया था कि धर्मी ठहराया जाना केवल विश्वास के द्वारा है, व्यवस्था के कामों के द्वारा नहीं। इस सातवें अध्याय में वह यह स्थापित करता है कि न केवल धर्मी ठहराया जाना विश्वास के द्वारा है, वरन् पवित्रीकरण भी केवल विश्वास के द्वारा ही है। “हे भाइयो, क्या तुम नहीं जानते (मैं व्यवस्था के जाननेवालों से कहता हूँ) कि जब तक मनुष्य जीवित रहता है, तब तक
