व्याख्यान 85 (253 में से)

घृणा दिखाने का तरीका यह है कि संसार की रीतियों और संसार के फ़ैशनों के पीछे-पीछे चलते रहें!

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घृणा दिखाने का तरीका यह है कि संसार की रीतियों और संसार के फ़ैशनों के पीछे-पीछे चलते रहें!

क्या ही बढ़िया तर्क है यह!

आपत्ति। “यदि हमारा मन ठीक है, तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि हम कैसे वस्त्र पहनते हैं?”

आपका मन ठीक है! तो फिर आपका मन ठीक हो सकता है जबकि आपका आचरण पूरी तरह गलत हो। इसी प्रकार कसम खानेवाला अपवित्र मनुष्य भी कह सकता है, “इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि मैं कौन से शब्द बोलता हूँ, यदि मेरा मन ठीक है।”

नहीं, जब तक आपका आचरण ठीक नहीं, आपका मन ठीक नहीं है। बाहरी आचरण मन की भीतरी दशा के प्रकट होने के सिवा और क्या है? यदि आपका मन ठीक होता, तो आप संसार के फ़ैशनों के पीछे चलना न चाहते।

आपत्ति। “पहनावे का मानदण्ड क्या है? जब तक आप हमें कोई मानदण्ड न दें, तब तक मुझे आपके इस सारे प्रचार और सादे पहनावे के विषय में नियम बनाने का कोई लाभ नहीं दिखता।”

बहुतों के लिए यह एक बड़ी ठोकर का कारण है। परन्तु किसी भी मन के लिए यह बात अत्यन्त सरल है। पूरी बात दो सरल नियमों में समाई जा सकती है। पहला यह है: अपनी सवारी, पहनावे और घर के सामान में इस बात का पूरा ध्यान रखें कि आप यह दिखाएँ कि आपकी उन लोगों के उद्देश्यों और सिद्धान्तों के साथ कोई संगति नहीं है जो अपने आप को सजाने-सँवारने और मनुष्यों की वाहवाही पाने का लक्ष्य रखते हैं। दूसरा यह है: पहले मितव्ययिता का ध्यान रखा जाए, और फिर सुविधा का। मसीही मितव्ययिता का पालन करें; अर्थात् मसीह की सेवा के लिए जितना बचा सकें उतना बचाएँ; और फिर वस्तुएँ उतनी सुविधाजनक हों जितनी मसीही मितव्ययिता अनुमति दे।

आपत्ति। “क्या आप चाहते हैं कि हम सब क्वेकर बन जाएँ, और उनका सादा पहनावा पहन लें?”

कौन नहीं जानता कि क्वेकरों के सादे पहनावे ने उनके लिए समाज के भक्तिहीनों में से सारे सोचने-समझनेवाले लोगों का आदर प्राप्त किया है? अब, यदि उन्होंने इसके साथ परमेश्वर के लिए वह उत्साह, और संसार से वह विरक्ति, और धन के प्रति वह तिरस्कार, और पापियों को मसीह की ओर फेराने के लिए वह आत्म-त्यागपूर्ण परिश्रम, जिनकी सुसमाचार आज्ञा देता है, और उद्धार की योजना की वह स्पष्ट समझ भी जोड़ी होती, जो सुसमाचार सिखाता है, तो वे बहुत पहले ही संसार का मन फिरा चुके होते।

और यदि सारे मसीही उनके सादे पहनावे में उनका अनुकरण करें, (मेरा अर्थ उनके पहनावे की ठीक वही काट और ढंग नहीं, बल्कि ऐसा सादा पहनावा जो संसार के फ़ैशनों पर तिरस्कार डाले,) तो कौन सन्देह कर सकता है कि संसार का मन-परिवर्तन तेज़ी से आगे बढ़ेगा?

आपत्ति। “क्या आप हम सब को मेथोडिस्ट बना देंगे?”

कौन नहीं जानता कि जब मेथोडिस्ट अपने सादे पहनावे के लिए, और संसार के फ़ैशनों और दिखावे को त्यागने के लिए प्रसिद्ध थे, तब प्रार्थना में परमेश्वर के साथ उनकी सामर्थ हुआ करती थी, और सच्चे मसीहियों के रूप में उन्हें संसार का सर्वत्र आदर प्राप्त था। और कौन नहीं जानता कि जब से उन्होंने इस विशेषता को छोड़ दिया है, और पहनावे तथा अन्य बातों में संसार के सदृश बन गए हैं, और मानो एक सम्प्रदाय के रूप में अपने आप को ऊँचा उठाने और संसार में प्रभाव पाने का प्रयत्न करते दिखते हैं, तब से वे प्रार्थना की सामर्थ खोते जा रहे हैं? परमेश्वर करे कि उन्होंने यह दीवार कभी न गिराई होती। वेस्ली की व्यवस्था की प्रमुख श्रेष्ठताओं में से एक यह थी कि उसके अनुयायी सादे पहनावे के द्वारा दूसरों से अलग पहचाने जाएँ।

आपत्ति। “हम फ़ैशनवाले पहनावे के समान सादे पहनावे पर भी घमण्ड कर सकते हैं। क्वेकर भी उतने ही घमण्डी हैं जितने हम।”

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