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बाइबल कहती है, “कोई भी पवित्र आत्मा के बिना नहीं कह सकता कि यीशु मसीह प्रभु है।” अब मसीह के ईश्वरत्व का अमूर्त कथन विज्ञान की बात के रूप में इस प्रकार सिद्ध किया जा सकता है कि किसी भी निष्पक्ष मन की सहमति इस सत्य के प्रति प्राप्त हो जाए कि यीशु प्रभु है। परन्तु पवित्र आत्मा के सिवाय और कोई भी मन को परमेश्वर के रूप में मसीह के विचार से इस प्रकार परिचित नहीं करा सकता कि प्राण उस तथ्य के विश्वास में स्थिर हो जाए, और वह हृदय को पवित्र करने के लिये प्रभावकारी बन जाए।
फिर, यह कहा गया है कि “कोई मेरे पास नहीं आ सकता, जब तक पिता, जिस ने मुझे भेजा है, उसे खींच न ले; और मैं उस को अन्तिम दिन फिर जिला उठाऊँगा। भविष्यद्वक्ताओं के लेखों में यह लिखा है, कि वे सब परमेश्वर की ओर से सिखाए हुए होंगे। इसलिये जिस किसी ने पिता से सुना और सीखा है, वह मेरे पास आता है।” यहाँ यह स्पष्ट है कि जिस खींचे जाने की बात कही गई है, वह पवित्र
आत्मा की शिक्षा है। इससे पहले कि उन्हें धर्म की बातों का ऐसा ज्ञान हो कि वे वास्तव में मसीह के पास आएँ, उन्हें परमेश्वर की ओर से सिखाया जाना, और पिता से सीखना आवश्यक है।
मसीह कहता है, “मेरा जाना तुम्हारे लिये अच्छा है, क्योंकि यदि मैं न जाऊँ, तो वह सहायक तुम्हारे पास न आएगा।” जिस शब्द पाराक्लीतोस का अनुवाद यहाँ (अंग्रेज़ी बाइबल में) “शान्तिदाता” किया गया है, उसका ठीक अर्थ है सहायक, या शिक्षक। “और वह आकर संसार को पाप और धार्मिकता और न्याय के विषय में निरुत्तर करेगा: पाप के विषय में इसलिये कि वे मुझ पर विश्वास नहीं करते; और धार्मिकता के विषय में इसलिये कि मैं पिता के पास जाता हूँ, और तुम मुझे फिर न देखोगे; न्याय के विषय में इसलिये कि संसार का सरदार दोषी ठहराया गया है।
मुझे तुम से और भी बहुत सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा, परन्तु जो कुछ सुनेगा, वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा।”
इसी प्रकार चौदहवें अध्याय में उद्धारकर्ता कहता है, “और मैं पिता से बिनती करूँगा, और वह तुम्हें एक और सहायक देगा, कि वह सर्वदा तुम्हारे साथ रहे; अर्थात् सत्य का आत्मा, जिसे संसार ग्रहण नहीं कर सकता, क्योंकि वह न उसे देखता है और न उसे जानता है; तुम उसे जानते हो, क्योंकि वह तुम्हारे साथ रहता है, और वह तुम में होगा।” और फिर, 26वें पद में, “परन्तु सहायक अर्थात् पवित्र आत्मा, जिसे पिता मेरे नाम से भेजेगा, वह तुम्हें सब बातें सिखाएगा, और जो कुछ मैं ने तुम से कहा है, वह सब तुम्हें स्मरण कराएगा।” यहाँ आप देखते हैं कि परमेश्वर के आत्मा का पद-कार्य यह है कि वह मनुष्यजाति को धर्म की बातों के विषय में शिक्षा दे।
अब, यह प्रकट है कि केवल परमेश्वर का आत्मा ही इस कमी को पूरा कर सकता है—इसी एक बात पर विचार करने से कि शब्दों के द्वारा दी गई सारी शिक्षा, चाहे वह यीशु मसीह के द्वारा हो, या प्रेरितों के द्वारा, या किसी भी ईश्वर-प्रेरित या बिना ईश्वर-प्रेरणा के शिक्षक के द्वारा, जो केवल इन्द्रियों के माध्यम से आती है, मन को आत्मिक बातों के विचार से कभी परिचित नहीं करा सकती। जिस प्रकार की शिक्षा की हमें आवश्यकता है, वह यह है; हमें कोई ऐसा चाहिए जो हमें धर्म की बातें सिखाए, और जिसे शब्दों पर निर्भर न रहना पड़े, या इन्द्रियों के माध्यम से हमारे मनों तक न पहुँचना पड़े। हमें कोई ऐसी रीति चाहिए जिससे स्वयं विचार हमारे मनों तक लाए जा सकें, न कि केवल विचारों के चिह्न। हमें एक ऐसा शिक्षक चाहिए जो इन्द्रियों के द्वारा नहीं, परन्तु सीधे मन तक पहुँच सके; और जो शब्दों का प्रयोग करने के लिये बाध्य हुए बिना धर्म के विचारों को प्रकट कर सके। यह परमेश्वर का आत्मा कर सकता है।
