व्याख्यान 246 (253 में से)

4. सिद्ध प्रेम के लिये यह आवश्यक नहीं कि हर एक व्यक्ति के लिये, या उसी व्यक्ति के लिये हर समय, प्रार्थना की आत्मा की

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4. सिद्ध प्रेम के लिये यह आवश्यक नहीं कि हर एक व्यक्ति के लिये, या उसी व्यक्ति के लिये हर समय, प्रार्थना की आत्मा की एक समान मात्रा हो।

शुद्ध और सिद्ध प्रेम के लिये प्रार्थना की आत्मा सदा आवश्यक नहीं है। स्वर्ग में पवित्र लोगों का सब प्राणियों के प्रति शुद्ध और सिद्ध प्रेम है, तौभी हम नहीं जानते कि उनमें किसी के लिये प्रार्थना की आत्मा है। आप किसी व्यक्ति से बहुत प्रबल मात्रा में प्रेम कर सकते हैं, और फिर भी उस व्यक्ति के लिये आपमें प्रार्थना की आत्मा न हो। अर्थात्, हो सकता है कि परमेश्वर का आत्मा आपको उस व्यक्ति के उद्धार के लिये प्रार्थना करने की अगुवाई न करे। आप नरक में पड़े दुष्टों के लिये प्रार्थना नहीं करते। प्रार्थना की आत्मा पवित्र आत्मा के प्रभावों पर निर्भर है, जो मन को उन बातों के लिये प्रार्थना करने की अगुवाई करते हैं जो परमेश्वर की इच्छा के अनुकूल हैं। आप सारी मनुष्यजाति के लिये आत्मा में, उत्साह और विश्वास की एक समान मात्रा के साथ, प्रार्थना नहीं कर सकते। यीशु मसीह ने स्पष्ट कहा कि वह सारी मनुष्यजाति के लिये प्रार्थना नहीं करता: “मैं संसार के लिये बिनती नहीं करता।” प्रार्थना की आत्मा के सम्बन्ध में यहाँ एक बड़ी भूल हुई है।

कुछ लोग समझते हैं कि जब तक पृथ्वी पर एक भी पापी है, और मसीहियों ने हर एक व्यक्ति के लिये विश्वास से प्रार्थना नहीं की है, तब तक उन्होंने अपना सारा कर्तव्य पूरा नहीं किया। तब तो यीशु मसीह ने कभी अपना सारा कर्तव्य पूरा नहीं किया, क्योंकि उसने ऐसा कभी नहीं किया। परमेश्वर ने हमसे कभी नहीं कहा कि वह सारी मनुष्यजाति का उद्धार करेगा, और न उसने हमें यह विश्वास करने का कभी कोई कारण दिया कि वह ऐसा करेगा। तो फिर हम सब के उद्धार के लिये विश्वास से कैसे प्रार्थना कर सकते हैं? उस विश्वास के टिकने का आधार क्या है?

5. सिद्ध प्रेम उस शिथिलता या शारीरिक दुर्बलता की अनुभूतियों से असंगत नहीं है, जो थकावट या अस्वस्थता का अनिवार्य परिणाम होती हैं।

हमारी बनावट ऐसी है कि उत्तेजना स्वभावतः और अनिवार्य रूप से हमारी शक्तियों को थका देती है।

परन्तु इसके बावजूद प्रेम सिद्ध हो सकता है। चाहे कोई व्यक्ति प्रार्थना करने की अपेक्षा लेटकर सो जाने की अधिक इच्छा अनुभव करे, फिर भी उसका प्रेम सिद्ध हो सकता है। प्रभु यीशु मसीह ने प्रायः यह थकावट और क्लान्ति अनुभव की, जब आत्मा तो तैयार था, परन्तु शरीर दुर्बल था।

IV. सिद्ध प्रेम के लिये क्या आवश्यक है।

1. इसका अर्थ यह है कि मन में ऐसा कुछ न हो जो प्रेम से असंगत हो।

न घृणा, न बैरभाव, न क्रोध, न डाह, और न कोई अन्य द्वेषपूर्ण भावना जो शुद्ध और सिद्ध प्रेम से असंगत हो।

2. कि जीवन में ऐसा कुछ न हो जो प्रेम से असंगत हो।

सब काम, वचन और विचार निरन्तर प्रेम के पूर्ण और सिद्ध नियंत्रण में रहें।

3. कि परमेश्वर के प्रति प्रेम सर्वोपरि हो।

परमेश्वर के प्रति प्रेम पूरी तरह सर्वोपरि हो, और अन्य सब पात्रों से इतना अधिक ऊपर हो, कि परमेश्वर की तुलना में और किसी वस्तु से प्रेम ही न किया जाए।

4. कि परमेश्वर के प्रति प्रेम निःस्वार्थ हो।

परमेश्वर से इसलिये प्रेम किया जाए कि वह जो है सो है; हमसे उसके सम्बन्ध के कारण नहीं, वरन् उसके चरित्र की श्रेष्ठता के कारण।

5. कि हमारे पड़ोसी के प्रति प्रेम समान हो, अर्थात् हम उसके हित और सुख को अपने हित और सुख के समान मूल्यवान समझें, और उसके और उसके हितों के साथ हमारा व्यवहार उसी के अनुसार हो।

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