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4. जब आप उस बात को समझ लेते हैं जिसके विषय में कोई व्यक्ति बोल रहा है, तो आपको यह समझना चाहिए कि वह उसी बात के विषय में बोल रहा है; और उसकी भाषा का ऐसा अर्थ नहीं लगाना चाहिए जो उसके उद्देश्य से असम्बद्ध हो, या उससे मेल न खाता हो।
इस नियम को आँखों से ओझल करके आप हर बात को निरर्थक बना सकते हैं। आप सदा इस बात के लिए बाध्य हैं कि भाषा की व्याख्या उस विषय के प्रकाश में करें जिस पर वह लागू की गई है, या जिसके विषय में वह कही गई है।
V. इन नियमों और सिद्धान्तों को रख देने के बाद, मैं उन्हीं के प्रकाश में इस खण्ड के अर्थ के विषय में अपना मत, उसके कारणों सहित, प्रस्तुत करने के लिए आगे बढ़ता हूँ। परन्तु पहले मैं एक-दो टिप्पणियाँ करूँगा।
पहली टिप्पणी। प्रेरित इस खण्ड में अपने ही विषय में बोल रहा था, या कोई काल्पनिक स्थिति मानकर चल रहा है, यह बात भाषा की सही व्याख्या के लिए कोई महत्व नहीं रखती।
बहुत से लोग यह मानते हैं कि क्योंकि वह उत्तम पुरुष में बोलता है, इसलिए यह समझना चाहिए कि वह अपने ही विषय में कह रहा है। परन्तु जब हम सामान्य सिद्धान्तों पर चर्चा कर रहे होते हैं, या किसी बात पर तर्क कर रहे होते हैं, तो उदाहरण के लिए, या किसी बात को स्थापित करने के लिए, कोई काल्पनिक स्थिति मान लेना एक सामान्य प्रथा है। और उसे उत्तम पुरुष में कहना बहुत स्वाभाविक है, बिना इस अभिप्राय के कि उसे किसी वास्तविक घटना या हमारे अपने अनुभव का वर्णन समझा जाए, और वास्तव में उसे कभी ऐसा समझा भी नहीं जाता। प्रेरित पौलुस यहाँ तर्क की एक कसी हुई शृंखला का अनुसरण कर रहा था, और वह इसे केवल उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता है। और यह बात किसी भी रीति से महत्वपूर्ण नहीं कि यह उसका अपना वास्तविक अनुभव है, या एक काल्पनिक स्थिति।
चाहे वह अपने विषय में बोल रहा हो, या किसी दूसरे व्यक्ति के विषय में, या कोई काल्पनिक स्थिति मान रहा हो, वह ऐसा आचरण के एक सामान्य सिद्धान्त को दिखाने के उद्देश्य से करता है, और यह दिखाने के लिए कि समान परिस्थितियों में सब लोग वैसा ही करेंगे। चाहे वह किसी मसीही के विषय में बोल रहा हो, या पश्चाताप न करनेवाले पापी के विषय में, वह एक सामान्य सिद्धान्त रखता है।
प्रेरित याकूब तीसरे अध्याय में उत्तम पुरुष में बोलता है; ताड़ना देते समय भी। “हे मेरे भाइयो, तुम में से बहुत उपदेशक न बनें, क्योंकि जानते हो, कि हम उपदेशक और भी दोषी ठहरेंगे। इसलिये कि हम सब बहुत बार चूक जाते हैं।”
“इसी से हम प्रभु और पिता की स्तुति करते हैं; और इसी से मनुष्यों को जो परमेश्वर के स्वरूप में उत्पन्न हुए हैं श्राप देते हैं।”
प्रेरित पौलुस सामान्य सिद्धान्तों पर चर्चा करते और उन्हें उदाहरणों से स्पष्ट करते समय प्रायः “मैं” कहता है, और उत्तम पुरुष का प्रयोग करता है: “सब वस्तुएँ मेरे लिये उचित तो हैं, परन्तु सब वस्तुएँ लाभ की नहीं; सब वस्तुएँ मेरे लिये उचित हैं, परन्तु मैं किसी बात के अधीन न हूँगा।” और फिर, “विवेक,
मेरा मतलब, तेरा अपना नहीं, परन्तु उस दूसरे का। भला, मेरी स्वतंत्रता दूसरे के विवेक से क्यों परखी जाए? यदि मैं धन्यवाद करके साझी होता हूँ, तो जिस पर मैं धन्यवाद करता हूँ, उसके कारण मेरी बदनामी क्यों होती है? अब हमें दर्पण में धुंधला सा दिखाई देता है; परन्तु उस समय आमने-सामने देखेंगे; इस समय मेरा ज्ञान अधूरा है; परन्तु उस समय ऐसी पूरी रीति से पहचानूँगा, जैसा मैं पहचाना गया हूँ। पर अब विश्वास, आशा, प्रेम ये तीनों स्थायी हैं, पर इनमें सबसे बड़ा प्रेम है।” इसी प्रकार, “क्योंकि जो कुछ मैंने गिरा दिया, यदि उसी को फिर बनाता हूँ, तो अपने आप को अपराधी ठहराता हूँ।” 1 कुरिन्थियों 4:6 में वह ठीक-ठीक समझाता है कि वह उदाहरणों का प्रयोग किस प्रकार करता है, “हे भाइयो, मैंने इन बातों में तुम्हारे लिये अपनी और
