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युगों में ऐसे अनेक मसीही हुए हैं जो समझदार और खरे थे, और जिनके विरुद्ध कुछ भी नहीं कहा जा सकता था, और जिन्होंने यह गवाही दी है कि वे स्वयं पाप से मुक्त जीवन बिताते थे। मैं जानता हूँ कि इसके उत्तर में कहा जाता है कि वे अवश्य घमण्डी रहे होंगे, और कि घमण्ड के सिवा और किसी कारण से कोई मनुष्य यह न कहेगा कि वह पाप से मुक्त है। परन्तु मैं पूछता हूँ, यदि बात सचमुच ऐसी ही हो, तो कोई मनुष्य घमण्डी हुए बिना यह क्यों नहीं कह सकता कि वह पाप से मुक्त है, ठीक वैसे ही जैसे वह घमण्डी हुए बिना यह कह सकता है कि उसका मन-परिवर्तन हो गया है? क्या पवित्र लोग स्वर्ग में परमेश्वर के उस अनुग्रह की स्तुति के लिए यह नहीं कहेंगे, जिसने इस प्रकार अपने महिमामय कार्य को पूर्णता का मुकुट पहनाया है? तो फिर वे इसी उद्देश्य से अभी क्यों न कहें? मैं स्वयं इस समय यह दावा नहीं करता कि मैंने सिद्ध पवित्रीकरण प्राप्त कर लिया है; परन्तु यदि मैंने उसे प्राप्त कर लिया होता, यदि मुझे यह अनुभव होता कि परमेश्वर ने सचमुच मुझे संसार, शरीर और शैतान पर विजय दे दी है और मुझे पाप से मुक्त कर दिया है, तो क्या मैं इसे एक भेद बनाकर अपने ही हृदय में बन्द रखता, और अपने भाइयों को इस बात से अनजान रहकर ठोकरें खाते हुए चलने देता कि परमेश्वर का अनुग्रह क्या कुछ कर सकता है?
कभी नहीं। मैं उन्हें बताता कि वे पूर्ण छुटकारे की आशा रख सकते हैं, यदि वे केवल सहायता की उस भुजा को थाम लें जिसे मसीह अपने लोगों को उनके पापों से बचाने के लिए आगे बढ़ाता है।
मैंने लोगों को ऐसी बातें करते सुना है कि यदि कोई मसीही सचमुच सिद्ध होता, तो वह इसके विषय में बतानेवाला सबसे अन्तिम व्यक्ति होता। परन्तु क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति के विषय में, जो मन-परिवर्तन का अंगीकार करता है, यह कहेंगे,
“यदि उसका सचमुच मन-परिवर्तन हुआ होता, तो वह इसके विषय में बतानेवाला सबसे अन्तिम व्यक्ति होता?” इसके विपरीत, क्या बदले हुए हृदय की पहली प्रेरणा यही नहीं होती कि वह कहे, “हे परमेश्वर के सब डरवैयो, आकर सुनो, मैं बताऊँगा कि उसने मेरे प्राण के लिये क्या क्या किया है!” तो फिर वही इच्छा उस व्यक्ति में क्यों न हो जो अनुभव करता है कि उसने पवित्रीकरण प्राप्त कर लिया है? ये सब सन्देह क्यों, और प्रमाण पर विश्वास करने से यह इनकार क्यों? यदि कोई व्यक्ति बड़ी भक्ति का प्रमाण देता है, यदि उसका जीवन निर्दोष है, और उसके स्वभाव के विषय में कोई शिकायत नहीं की जा सकती, यदि वह परमेश्वर के पुत्र का ही स्वभाव प्रकट करता है, और यदि ऐसा व्यक्ति गवाही देता है कि बड़े संघर्षों और वेदना-भरी प्रार्थना के बाद परमेश्वर ने उसे विजय दी है, और ईश्वरीय अनुग्रह की सामर्थ से उसका प्राण स्वतंत्र कर दिया गया है; तो हम उसकी गवाही को ठीक उतना ही स्वीकार करने के लिए बाध्य क्यों नहीं हैं, जितना तब जब वह कहता है कि उसका मन-परिवर्तन हुआ है? यहाँ तक तो हम ऐसी गवाही सदा स्वीकार करते हैं। और अब, जब वह कहता है कि वह और आगे बढ़ गया है, और उसने सब पापों पर विजय पा ली है, और कि मसीह ने इस विषय में अपनी प्रतिज्ञा को सचमुच पूरा किया है, तो हम इस पर भी विश्वास क्यों न करें?
मैंने हाल ही में मिस्टर वेस्ली की पुस्तक “मसीही सिद्धता का सरल विवरण” पढ़ी है, जिसे मैंने कुछ समय पहले तक कभी देखा भी नहीं था। उसमें मुझे कुछ ऐसी अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं जिन पर मुझे आपत्ति होगी, परन्तु मेरा विचार है कि आपत्ति भावों पर नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति पर ही है। और मैं समझता हूँ कि इतनी कमी को छोड़कर यह एक उत्तम पुस्तक है, और मैं चाहता हूँ कि इस कलीसिया का हर सदस्य इसे पढ़े। इसी नगर में इसका एक संस्करण छप रहा है। मैं जेम्स ब्रेनर्ड टेलर के जीवन-वृत्तान्त की भी सिफ़ारिश करूँगा, और मैं चाहता हूँ कि हर
मसीही उसे प्राप्त करे और उसका अध्ययन करे। पिछले कुछ महीनों में मैंने उसका अधिकांश भाग तीन बार पढ़ा है।
उस पुस्तक की बहुत-सी बातों से यह स्पष्ट है कि वे इस सिद्धान्त पर विश्वास करते थे कि मसीही सिद्धता एक कर्तव्य है, और कि विश्वासी इसे इसी जीवन में प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा कुछ भी प्रकाशित नहीं हुआ है जिससे यह दिखे कि उन्होंने इसे प्राप्त कर लेने का दावा किया, परन्तु यह प्रकट है कि वे इसे प्राप्त करने योग्य मानते थे। परन्तु मुझे बताया गया है कि इस विषय पर उनकी दैनन्दिनी में जो बहुत-कुछ लिखा है, और उनके पत्रों की भी कुछ बातें, उनके जीवनी-लेखकों ने दबा दीं, यह समझकर कि वे बातें इस योग्य नहीं कि
