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और इसी प्रकार यह कहना, “मैं ऐसा नहीं कर सका,” जबकि उनका अभिप्राय केवल यह होता है कि वे ऐसा करना नहीं चाहते थे, और, वे चाहते तो कर सकते थे।
कुछ ही समय पहले मैंने एक पादरी से अगले सब्त के दिन मेरे स्थान पर प्रचार करने को कहा। उसने उत्तर दिया, “मैं नहीं कर सकता।”
बाद में मुझे पता चला कि वह चाहता तो कर सकता था। मैंने एक व्यापारी से कहा कि वह किसी कपड़े के थान का अमुक दाम ले ले। उसने कहा, “मैं ऐसा नहीं कर सकता।” उसका क्या अभिप्राय था? क्या यह कि उसमें ऐसा दाम स्वीकार करने की शक्ति नहीं थी? बिलकुल नहीं। वह चाहता तो कर सकता था, परन्तु उसने ऐसा करना नहीं चुना। जब मैं यह अध्याय पढ़ूँगा, तब आप इन टिप्पणियों का सम्बन्ध देखेंगे। अब मैं आगे बढ़ता हूँ।
व्याख्या के कई ऐसे नियम देना, जो न केवल बाइबल की व्याख्या पर, वरन् सब लिखित दस्तावेज़ों की व्याख्या पर, और हर प्रकार के प्रमाण पर लागू होते हैं।
प्रमाण के कुछ ऐसे नियम हैं जिन्हें दस्तावेज़ों के अर्थ, और गवाहों की गवाही, और सब लेखों का अर्थ निश्चित करने में लागू करने के लिए सब मनुष्य बाध्य हैं।
1. हमें भाषा का सदा वही अर्थ लगाना चाहिए जो विषय के स्वभाव से आवश्यक हो।
हम सदा इस बात के लिए बाध्य हैं कि किसी व्यक्ति की भाषा को उसी रूप में समझें जिस रूप में वह चर्चा के विषय पर लागू होती है। यदि आप विषय को आँखों से ओझल कर दें, और वे किस बारे में बोल रहे हैं इसका ध्यान किए बिना उसकी व्याख्या करने की छूट ले लें, तो साधारण जीवन की अधिकांश भाषा को तोड़-मरोड़कर कुछ भी अर्थ निकाला जा सकता है। इस सिद्धान्त का उल्लंघन करके पवित्रशास्त्र के अलग-अलग खण्डों और एकाकी वाक्यांशों की व्याख्या करने से कितनी हानि हुई है! मुख्य रूप से इसी सरल नियम की उपेक्षा करने से पवित्रशास्त्र को तोड़-मरोड़कर ऐसी भूलों और विरोधाभासों के समर्थन में लगा दिया गया है जो अनगिनत हैं और हर अनुमान से परे मूर्खतापूर्ण हैं। यह नियम सब कथनों पर लागू होता है। न्यायालय कभी भी ऐसे विकृत अर्थों की अनुमति न देते जैसे बाइबल के साथ किए गए हैं।
2. यदि किसी व्यक्ति की भाषा में गुंजाइश हो, तो हम सदा इस बात के लिए बाध्य हैं कि उसका ऐसा अर्थ लगाएँ जिससे वह अपने आप से मेल खाता ठहरे।
जब तक आप इस नियम का पालन न करें, आप किसी भी व्यक्ति से किसी भी विषय पर पाँच मिनट भी बातचीत नहीं कर सकते जिसमें आप उससे अपनी ही बात का खण्डन न करवा दें। यदि आप इस नियम को न मानें, तो कोई मनुष्य कभी अपने विचार इस प्रकार कैसे व्यक्त कर सकता है कि दूसरा मनुष्य उन्हें समझ ले? कोई गवाह कभी जूरी के सामने तथ्यों को कैसे प्रकट कर सकता है, यदि इस नियम के बन्धन के बिना उसकी भाषा को मनमाने ढंग से तोड़ा-मरोड़ा जाए?
3. किसी व्यक्ति की भाषा की व्याख्या करते समय हमें सदा उस बात को ध्यान में रखना चाहिए जिसके विषय में वह बोल रहा है।
हमें उसके तर्क के विस्तार को, उसके सामने के उद्देश्य को, और उस बात को समझना चाहिए जिसके विषय में वह बोल रहा है। नहीं तो निश्चय ही हम उसकी भाषा को नहीं समझेंगे। मान लीजिए
कि मैं कोई पुस्तक उठाऊँ, कोई भी पुस्तक, और उस उद्देश्य पर अपनी दृष्टि न रखूँ जो लेखक के सामने उसे लिखते समय था, और न उस बात पर जिसे वह लक्ष्य बना रहा है, तो मैं उस पुस्तक को कभी नहीं समझ सकता। यह देखना सरल है कि व्याख्या के प्रथम सिद्धान्तों की उपेक्षा करके पवित्रशास्त्र की व्याख्या करने की प्रथा से कैसी अनगिनत भूलें उत्पन्न हुई हैं।
