व्याख्यान 46 (253 में से)

पापियों के मन-परिवर्तन के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं, और संसार की धारा के साथ बहे जा रहे हैं, और

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पापियों के मन-परिवर्तन के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं, और संसार की धारा के साथ बहे जा रहे हैं, और आप पाएँगे कि परमेश्वर और मनुष्य के सच्चे मित्र ऐसी दशा से दुखी हैं। जो लोग धार्मिक होने में दूसरे उद्देश्य रखते हैं, वे सोच सकते हैं कि वे बहुत अच्छी तरह चल रहे हैं।

जब वे परमेश्वर के कहलानेवाले लोगों को दिखावे और मूर्खता के पीछे भागते देखते हैं, तो वे दुखी नहीं होते।

परन्तु यदि इस वर्ग के कोई लोग वहाँ हों, तो आप उन्हें मन में दुखी और व्याकुल पाएँगे, क्योंकि कलीसिया ऐसी दशा में है।

13. यदि उन्हें यह सोचने का कारण दिखाई दे कि उनका पादरी समय देखकर समझौता करता है, या कलीसिया को उसके पापों के लिए तीखेपन और विश्वासयोग्यता से नहीं डाँटता, तो वे दुखी होते हैं।

अंगीकार करनेवालों के दूसरे वर्ग लोरी सुनाकर सुला दिए जाने को तैयार रहते हैं, और इस बात से सन्तुष्ट रहते हैं कि उनका पादरी चिकने-चुपड़े, अलंकृत और वाक्पटु उपदेश, और चापलूसी-भरे उपदेश दे, जिनमें न कोई धार हो और न कोई सामर्थ। परन्तु ये तब तक सन्तुष्ट नहीं होते जब तक वह सामर्थ के साथ, तीखेपन से और निडरता से प्रचार न करे, और सब प्रकार की सहनशीलता और शिक्षा के साथ उलाहना न दे, और विनती न करे, और न समझाए। जो कुछ भी पकड़ न करे और वह काम न करे जिसके लिए यीशु मसीह ने सेवकाई को ठहराया था, उससे उनके प्राणों को न भोजन मिलता है, न उनकी उन्नति होती है, न उन्हें सन्तोष मिलता है।

14. इस वर्ग के लोग सदा ऐसे विश्वासयोग्य पादरी के साथ खड़े रहेंगे जो निडरता और तीखेपन से सत्य का प्रचार करता है।

चाहे उसके द्वारा प्रचारित सत्य उन्हीं पर चोट करे, वे उसे पसन्द करते हैं, और कहते हैं, धर्मी मुझ को मारे, तो यह मेरे सिर पर का उत्तम तेल ठहरेगा। जब सत्य सामर्थ के साथ उँडेला जाता है, तो उनके प्राणों को भोजन मिलता है, और वे अनुग्रह में बलवन्त होते जाते हैं। वे ऐसे पादरी के लिए प्रार्थना कर सकते हैं। वे अपनी कोठरी में रो सकते हैं, और उसके लिए प्रार्थना में अपने प्राण उँडेल सकते हैं कि परमेश्वर का आत्मा सदा उसके साथ रहे। जब दूसरे लोग उसे कोसते और उसमें मीन-मेख निकालते हैं और कहते हैं कि वह हद से आगे बढ़ जाता है, इत्यादि, तब आप पाएँगे कि इस प्रकार के मसीही उसके साथ खड़े रहेंगे—हाँ, और यीशु की गवाही के कारण उसके साथ काठ पर जलाए जाने को भी चले जाएँगे। और यह वे सबसे उत्तम कारण से करते हैं—ऐसा प्रचार उस महान अभिप्राय से मेल खाता है जिसके लिए ये मसीही जीते हैं।

15. इस प्रकार के मसीही विशेष रूप से तब व्याकुल होते हैं जब पादरी ऐसे उपदेश देते हैं जो पापियों का मन फिराने के योग्य नहीं होते।

मेरा अर्थ उस समय से है जब उपदेश विशेष रूप से कलीसिया को, उसे उभारने के लिए, सम्बोधित न किया गया हो।

दूसरे लोग उस उपदेश को सराह सकते हैं, और उसकी प्रशंसा कर सकते हैं, और बता सकते हैं कि वह कैसा महान उपदेश है, या कितना वाक्पटु, या स्पष्ट, या भव्य, या उदात्त है; परन्तु यदि उसमें यह एक विशेषता—पापियों का मन फिराने की प्रवृत्ति—न हो, तो वह इन्हें नहीं भाता। आप कुछ ऐसे लोगों को पाएँगे जो चुनाव के सिद्धान्त पर बड़ा अड़ते हैं, और जब तक किसी उपदेश में चुनाव का सिद्धान्त न हो, वे उसे सुसमाचार का उपदेश मानेंगे ही नहीं; परन्तु यदि उसमें चुनाव का सिद्धान्त हो, तो वे सन्तुष्ट हो जाते हैं, चाहे वह पापियों का मन फिराने के योग्य हो या न हो। परन्तु जहाँ किसी मनुष्य का मन पापियों के मन-परिवर्तन पर लगा है, यदि वह ऐसा उपदेश सुनता है जो यह काम करनेवाला नहीं, तो उसे लगता है मानो उसमें वह “बड़ी बात” नहीं है जो सुसमाचार के उपदेश को सुसमाचार का उपदेश बनाती है। परन्तु यदि वे ऐसा उपदेश सुनते हैं जो प्राणों को बचानेवाला हो, तो उन्हें भोजन मिलता है, और उनके प्राण आनन्दित होते हैं।

इसलिए आप देखते हैं कि लोग प्रचार के विषय में जो राय देते हैं, उसमें आप अक्सर जो आश्चर्यजनक अन्तर पाते हैं, उसका आधार क्या है। वास्तव में चरित्र की इससे अच्छी कोई परख नहीं है।

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