व्याख्यान 194 (253 में से)

इसलिये चाहिये कि तुम वैसे ही सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है। मत्ती 5:48।

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अध्याय 19: मसीही सिद्धता। इसलिये चाहिये कि तुम वैसे ही सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है। मत्ती 5:48।

43वें पद में उद्धारकर्ता कहता है, “तुम सुन चुके हो, कि कहा गया था; कि अपने पड़ोसी से प्रेम रखना, और अपने बैरी से बैर। परन्तु मैं तुम से यह कहता हूँ, कि अपने बैरियों से प्रेम रखो, जो तुम्हें श्राप दें उनको आशीष दो, जो तुम से बैर करें उनका भला करो, और जो तुम्हारा अपमान करें और तुम्हें सताएँ उनके लिये प्रार्थना करो। जिस से तुम अपने स्वर्गीय पिता की सन्तान ठहरोगे क्योंकि वह भलों और बुरों दोनों पर अपना सूर्य उदय करता है, और धर्मियों और अधर्मियों दोनों पर मेंह बरसाता है।

क्योंकि यदि तुम अपने प्रेम रखनेवालों ही से प्रेम रखो, तो तुम्हारे लिये क्या फल होगा? क्या चुंगी लेनेवाले भी ऐसा ही नहीं करते? और यदि तुम केवल अपने भाइयों ही को नमस्कार करो, तो कौन सा बड़ा काम करते हो? क्या चुंगी लेनेवाले भी ऐसा नहीं करते? इसलिये चाहिये कि तुम वैसे ही सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है।”

मसीही सिद्धता के विषय पर बोलते हुए, मेरा विचार इस क्रम का पालन करने का है:

I. मैं यह दिखाऊँगा कि “इसलिये चाहिये कि तुम सिद्ध बनो” इस माँग से क्या नहीं समझना चाहिए; अर्थात् मसीही सिद्धता क्या नहीं है। II. यह दिखाऊँगा कि यहाँ कौन सी सिद्धता माँगी गई है। III. कि यह सिद्धता एक कर्तव्य है। IV. कि यह प्राप्त की जा सकती है; और, V. उन आपत्तियों में से कुछ का उत्तर दूँगा जो मसीही सिद्धता के सिद्धान्त के विरुद्ध सामान्यतः उठाई जाती हैं।

I. मुझे आपको यह दिखाना है कि मसीही सिद्धता क्या नहीं है।

1. यह माँग नहीं की गई कि हममें वे ही स्वाभाविक सिद्धताएँ हों जो परमेश्वर में हैं।

परमेश्वर में दो प्रकार की सिद्धताएँ हैं, स्वाभाविक और नैतिक। उसकी स्वाभाविक सिद्धताएँ उसके स्वभाव, सार, या गठन को बनाती हैं। वे हैं उसकी अनन्तता, अपरिवर्तनशीलता, सर्वशक्तिमत्ता, इत्यादि।

इन्हें स्वाभाविक सिद्धताएँ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनका कोई नैतिक स्वरूप नहीं है। ये ऐच्छिक नहीं हैं। परमेश्वर ने इन्हें स्वयं को नहीं दिया, क्योंकि उसने अपने आप को सृजा नहीं, वरन् वह अनन्तकाल से इन सब स्वाभाविक गुणों को पूर्ण रूप से धारण किए हुए विद्यमान रहा है। परमेश्वर इन सबको असीम मात्रा में धारण करता है। ये स्वाभाविक सिद्धताएँ वह सिद्धता नहीं हैं जो यहाँ माँगी गई है। हमारे स्वभाव के गुण हममें सृजे गए थे, और हमसे यह माँग नहीं की जाती कि हम कोई नए स्वाभाविक गुण उत्पन्न करें, और न यह सम्भव होता। हमसे यह माँग नहीं की जाती कि हम इनमें से किसी को भी उस मात्रा में धारण करें जिस मात्रा में परमेश्वर उन्हें धारण करता है।

2. पाठ में माँगी गई सिद्धता ज्ञान की सिद्धता नहीं है, हमारी सीमित क्षमताओं के अनुसार भी नहीं।

3. मसीही सिद्धता, जैसी यहाँ माँगी गई है, परीक्षा से मुक्ति नहीं है, चाहे वह परीक्षा हमारे गठन से आए या हमारे चारों ओर की वस्तुओं से। मन की शारीरिक भूखों के द्वारा चाहे कितनी भी कड़ी परीक्षा हो, तौभी हो सकता है कि वह पाप न करे। याकूब प्रेरित कहता है, “परन्तु प्रत्येक व्यक्ति अपनी ही अभिलाषा में खिंचकर, और फँसकर परीक्षा में पड़ता है।” पाप परीक्षाओं में नहीं, वरन् उनके आगे झुक जाने में है। एक व्यक्ति की परीक्षा शैतान के द्वारा भी हो सकती है, और भूखों के द्वारा भी, या संसार के द्वारा भी, और फिर भी उसमें पाप न हो। सारा पाप अभिलाषाओं के प्रति ऐच्छिक सहमति में निहित है।

4. न ही मसीही सिद्धता का अर्थ उस बात से मुक्ति है जिसे मसीही युद्ध समझा जाना चाहिए।

5. माँगी गई सिद्धता वह असीम नैतिक सिद्धता नहीं है जो परमेश्वर में है; क्योंकि मनुष्य, एक सीमित प्राणी होने के कारण, असीम भावनाओं के योग्य नहीं है। परमेश्वर स्वयं में असीम होने के कारण, उसके लिए सिद्ध होने का अर्थ असीम रूप से सिद्ध होना है। परन्तु यह हमसे नहीं माँगा जाता।

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