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प्रश्न के घेरे में ला दे, या उसकी ईमानदारी को। कम से कम इतना तो कहा ही जा सकता है कि इस बात पर सन्देह उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त प्रमाण है कि क्या वह सचमुच कोई कल्पित कथा और छल है। वास्तव में यह तो प्रमाण का एक छोटा-सा ही भाग है, परन्तु हम इसी आधार पर बात करेंगे। अब क्या उसका कर्तव्य है कि वह उसे अस्वीकार करे? कोई भी देववादी यह दावा नहीं करता कि वह अपने मन में इतना पूरा निश्चय कर सकता है कि सब सन्देहों से मुक्त हो जाए। वह केवल इतना ही करने का साहस करता है कि दूसरी ओर कुतर्क उठाए और सन्देह उत्पन्न करे। तो यहाँ उसका कर्तव्य है कि वह रुक जाए, और जब तक वह बिना किसी सन्देह के यह प्रमाणित न कर सके कि बाइबल परमेश्वर की ओर से नहीं है, तब तक उसका विरोध न करे।
यूनिटेरियन के साथ भी ऐसा ही है। यह मान भी लें (जो कदापि सच नहीं है) कि बाइबल में दिया गया प्रमाण इस विषय के सब सन्देहों को दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि यीशु मसीह परमेश्वर है; तौभी वह दूसरी ओर सन्देह उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त प्रमाण देता है, और उसे इस शिक्षा को असत्य कहकर अस्वीकार करने का कोई अधिकार नहीं है, बल्कि उसका कर्तव्य है कि वह नम्रता से पवित्रशास्त्र में ढूँढ़े और अपना सन्तोष कर ले। अब कोई भी समझदार और ईमानदार मनुष्य यह नहीं कह सकता कि पवित्रशास्त्र मसीह के ईश्वरत्व का “कोई प्रमाण नहीं” देता। वह ऐसा प्रमाण देता है जिसने अत्यन्त तीक्ष्ण बुद्धिवाले हज़ारों लोगों को, जो पहले इस शिक्षा के विरोधी थे, कायल किया है और पूरी तरह सन्तुष्ट किया है। कोई भी मनुष्य बिना सन्देह के इस शिक्षा को अस्वीकार नहीं कर सकता, क्योंकि यहाँ इस बात का प्रमाण है कि यह सच हो सकती है। और यदि यह सच हो सकती है, और यह सन्देह करने का कारण है कि यह असत्य है भी या नहीं, तो वह इसे अपने ही जोखिम पर अस्वीकार करता है।
फिर यूनिवर्सलिस्ट को लीजिए। ऐसा कौन है जो कह सके कि उसे इस बात पर तनिक-सा भी सन्देह नहीं कि शायद सचमुच कोई नरक हो, जहाँ पापी मृत्यु के बाद अनन्त यातना में जाते हैं। उसका कर्तव्य है कि वह रुके और पूछताछ करे, और पवित्रशास्त्र में ढूँढ़े। उसके लिए यह कह देना पर्याप्त नहीं कि वह नरक पर विश्वास नहीं करता। हो सकता है कि नरक हो, और यदि वह इसे अस्वीकार करता है, और इस सत्य की परवाह किए बिना आगे बढ़ता जाता है कि नरक है या नहीं, तो यही बात उसे परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही बना देती है। उसे सन्देह है कि शायद कोई ऐसा नरक सचमुच हो जिससे उसे बचना चाहिए, और फिर भी वह ऐसे काम करता है मानो उसे पूरा निश्चय हो और कोई सन्देह न हो।
वह दोषी ठहरता है। मैं एक चिकित्सक को जानता था जो यूनिवर्सलिस्ट था, और जो अपनी अटकलों की वास्तविकता को परखने के लिए अनन्तकाल में जा चुका है।
उसने एक बार मुझसे कहा कि उसे यूनिवर्सलिज़्म की सच्चाई पर गहरे सन्देह थे, और उसने अपने सन्देह एक पादरी को बताए थे, जिसने स्वीकार किया कि उसे भी उसकी सच्चाई पर सन्देह है, और उसे विश्वास नहीं कि संसार में कोई भी ऐसा यूनिवर्सलिस्ट है जिसे सन्देह न हो।
2. किसी मनुष्य का कोई काम तब करना, जब उसे सन्देह है कि वह उचित है या नहीं, यह दिखाता है कि वह स्वार्थी है, और परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के सिवा उसके और भी उद्देश्य हैं।
इससे प्रकट होता है कि वह अपने आप को तृप्त करने के लिए उसे करना चाहता है। उसे सन्देह है कि परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा या नहीं, और फिर भी वह उसे करता है। क्या वह विद्रोही नहीं है? यदि वह सच्चे मन से परमेश्वर की सेवा करना चाहता, तो सन्देह होने पर वह रुक जाता, और जब तक सन्तुष्ट न हो जाता, तब तक पूछताछ और जाँच करता रहता। परन्तु सन्देह में रहते हुए आगे बढ़ जाना यह दिखाता है कि वह स्वार्थी और दुष्ट है, और परमेश्वर प्रसन्न हो या न हो, वह उसे करने को तैयार है, और वह उसे करना चाहता है, चाहे वह ठीक हो या गलत। वह उसे इसलिए करता है क्योंकि वह उसे करना चाहता है, इसलिए नहीं कि वह ठीक है।
3. ऐसा करना परमेश्वर की भलाई पर दोष लगाना है।
वह यह मानकर चलता है कि यह अनिश्चित है कि परमेश्वर ने अपनी इच्छा का पर्याप्त प्रकाशन दिया है या नहीं, जिससे यदि वह चाहे तो अपना कर्तव्य जान सके। वह वास्तव में यह कहता है कि कर्तव्य का मार्ग इतना सन्दिग्ध छोड़ दिया गया है कि उसे अटकल से ही निर्णय करना पड़ता है।
