व्याख्यान 68 (253 में से)

पक्ष में जितना चाहें, ऐसे लोगों तक पहुँचने का केवल एक ही मार्ग है, और वह है

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पक्ष में जितना चाहें, ऐसे लोगों तक पहुँचने का केवल एक ही मार्ग है, और वह है एक नया जनमत उत्पन्न करना। जब आप परोपकार और विवेक की सामर्थ के द्वारा समाज में इतने लोगों को अपनी ओर कर लेंगे कि उसके पक्ष में जनमत बन जाए, तब वे आपके नए प्रस्तावों को अपना लेंगे, उससे पहले नहीं।

17. वे उस बात से सदा व्याकुल रहते हैं जिसे वे आज के समय का “अतिवाद” कहते हैं।

वे बहुत डरते हैं कि आज के समय का अतिवाद कलीसिया का नाश कर देगा। वे कहते हैं कि हम बातों को बहुत दूर तक खींच रहे हैं, और इससे उलटी प्रतिक्रिया उत्पन्न होगी। उदाहरण के लिए संयम-सुधार आन्दोलन को लीजिए। संयम के सच्चे मित्र अब जानते हैं कि अल्कोहल जहाँ कहीं भी पाया जाए, वह एक ही वस्तु है, और संसार को बचाने तथा असंयम को दूर भगाने के लिए यह आवश्यक है कि अल्कोहल को उसके सब रूपों में दूर किया जाए। संयम-सुधार आन्दोलन की असली कसौटी का निर्णय अभी तक हुआ ही नहीं है। समाज के अधिकांश लोगों से इस कार्य के लिए कभी किसी आत्म-त्याग की माँग नहीं की गई। कसौटी का स्थान तब आएगा जब यह प्रश्न सामने आएगा कि क्या मनुष्य इस बुराई को कुचलने के लिए आत्म-त्याग करेंगे। यदि वे दाखमधु और बीयर पीते रह सकते हैं, तो तेज़ शराब छोड़ देना कोई आत्म-त्याग नहीं है। यह तो केवल उस रूप को बदलना है जिसमें अल्कोहल लिया जाता है, और वे पहले की तरह ही खुलकर पी सकते हैं।

इस कार्य के बहुत-से मित्र, जब उन्होंने देखा कि भीड़ की भीड़ उसमें दौड़ी चली आ रही है, विजय का जयजयकार करने को तैयार हो गए। परन्तु असली प्रश्न की परीक्षा अभी तक नहीं हुई है। और बहुत-से लोग तब तक कभी नहीं झुकेंगे, जब तक परमेश्वर और मनुष्य के मित्र ऐसा प्रबल जनमत न बना सकें जो हर उस मनुष्य की प्रतिष्ठा को कुचल दे जो उसे न छोड़े। आपको धर्मविज्ञान के बहुत-से डॉक्टर और कलीसिया के खम्भे मिलेंगे, जो अपना दाखमधु पीने का सामर्थ्य रखते हैं, और जो अपनी बात पर अड़े रहेंगे; और परमेश्वर की कोई आज्ञा, परोपकार की कोई माँग, प्राणों को बचाने की कोई इच्छा, लहूलुहान मानवता पर कोई तरस ऐसे लोगों को नहीं हिलाएगा, जब तक आप ऐसा शक्तिशाली जनमत न बना सकें जो उन्हें प्रतिष्ठा खोने के दण्ड के भय से ऐसा करने को विवश कर दे। क्योंकि वे मनुष्यों की प्रशंसा से प्रेम रखते हैं।

और अब मेरे मन में यह एक प्रश्न है, गम्भीर और चिन्ता-भरे सन्देह का विषय, कि कलीसिया में भक्ति की वर्तमान गिरी हुई दशा और धार्मिक जागृतियों के ह्रास के इस समय में, क्या इतना शक्तिशाली जनमत बनाया जा सकता है कि वह यह कर सके। यदि नहीं, तो हमें पीछे धकेल दिया जाएगा। संयम-सुधार आन्दोलन रेत के बाँध की तरह बह जाएगा, बाढ़ के फाटक फिर से खुल जाएँगे, और संसार लड़खड़ाता हुआ नरक में उतर जाएगा। और फिर भी धर्म का अंगीकार करनेवाले हज़ारों लोग, जो सार्वजनिक आदर का आनन्द भी लेना चाहते हैं और साथ ही अपनी ही रीति से मौज भी करना चाहते हैं, ऐसे चिल्ला रहे हैं मानो वे इस समय के अतिवाद से बड़े दुःख में हों!

18. जब तक कोई मनुष्य, कोई तरीके और कोई बातें अलोकप्रिय होती हैं और निन्दा के पात्र होती हैं, तब तक वे प्रायः उनका विरोध करते हैं; और जब वे लोकप्रिय हो जाती हैं, तब वे उनके साथ हो लेते हैं।

कोई व्यक्ति किसी भी क्षेत्र की कलीसियाओं में जाए और उन्हें धर्म की जागृति के लिए जगाए, तो जब तक वह कम जाना-पहचाना होता है, ये लोग उसके विरुद्ध बोलने में पीछे नहीं रहते। परन्तु उसे आगे बढ़ने दीजिए और प्रभाव प्राप्त करने दीजिए, तो वे उसके साथ हो लेंगे और उसकी सराहना करेंगे और उसके सबसे घनिष्ठ मित्र होने का दावा करेंगे। यीशु मसीह के साथ भी ठीक ऐसा ही हुआ। अपनी मृत्यु से पहले उसे एक सीमा तक लोकप्रियता प्राप्त थी। जब वह गलियों में से होकर जाता था, तो भीड़ की भीड़ उसके पीछे हो लेती थी,

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