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और “होशाना, होशाना!” पुकारती थी। परन्तु ध्यान दीजिए, जितनी दूर तक उसकी लोकप्रियता उसके पीछे चली, उससे एक कण भर भी आगे वे कभी उसके पीछे नहीं गए। ज्योंही वह एक अपराधी के रूप में पकड़ा गया, वे सब पलट गए और चिल्लाने लगे, “उसे क्रूस पर चढ़ा, क्रूस पर चढ़ा!”
इस प्रकार के लोग, जैसे जब किसी मनुष्य की निन्दा होती है तो धारा के साथ एक ओर बह जाते हैं, वैसे ही जब उसका आदर होने लगता है तो धारा के साथ दूसरी ओर बह जाएँगे। इसमें केवल एक अपवाद है। और वह तब होता है जब वे विरोध में इतनी दूर तक बँध चुके होते हैं कि बिना अपमान के पलट नहीं सकते। तब वे चुप रहेंगे, जब तक कि उन भीतर ही भीतर सुलगती और कसकती आगों को बाहर निकालने का कोई दूसरा अवसर न आ जाए।
बहुत बार किसी कलीसिया में जागृति, जब वह पहले-पहल आरम्भ होती है, तो कलीसिया के कुछ सदस्यों द्वारा उसका विरोध किया जाता है। उन्हें ऐसी बातों का चलाया जाना अच्छा नहीं लगता, उन्हें डर होता है कि इसमें बहुत अधिक शारीरिक उत्तेजना है, इत्यादि। परन्तु कार्य आगे बढ़ता जाता है; और कुछ समय बाद वे भी मानो उसमें सम्मिलित होकर भीड़ के साथ चलने लगते हैं। अन्त में जागृति समाप्त हो जाती है, और कलीसिया फिर से ठण्डी पड़ जाती है, और थोड़े ही समय में आप पाएँगे कि इस प्रकार के लोग उस कार्य के प्रति अपना विरोध फिर से आरम्भ कर देते हैं, और ज्यों-ज्यों कलीसिया गिरती जाती है, वे अपने विरोध पर ज़ोर देते जाते हैं, और सम्भवतः अन्त में स्वयं कलीसिया को उसी जागृति के विरुद्ध खड़ा होने के लिए उकसा देते हैं जिसका उन्होंने इतना आनन्द उठाया था। इस देश में जागृतियों के सम्बन्ध में लोगों ने ठीक इसी प्रकार आचरण किया है। ऐसे बहुत-से उदाहरण हैं। जब तक जागृति अपनी सामर्थ में थी, तब तक वे जनमत से भयभीत होकर उसके आगे झुकने को विवश हुए, परन्तु कुछ समय बाद, ज्यों-ज्यों जागृति घटती जाती है, वे उस विरोध को बाहर निकालने लगते हैं जो उनके मन में है, और जो कुछ समय के लिए इसलिए दबा रहा क्योंकि जागृति लोकप्रिय थी।
कुछ हद तक मिशन के कार्य के सम्बन्ध में भी ठीक ऐसा ही हुआ है, और यदि मिशनों के विरुद्ध कोई ऐसी बात सामने आ जाए जिससे उनके पक्ष में जनमत की वर्तमान शक्ति टूट जाए, तो आप पाएँगे कि अच्छे मौसम के ये बहुत-से समर्थक विरोध की ओर मुड़ जाएँगे।
19. यदि धर्म को बढ़ावा देने के लिए कोई उपाय प्रस्तावित किया जाए, तो वे इस विषय में बहुत संवेदनशील और सतर्क रहते हैं कि कोई ऐसा काम न किया जाए जो अलोकप्रिय हो।
यदि वे किसी नगर में रहते हैं, तो वे पूछते हैं कि दूसरी कलीसियाएँ ऐसे उपाय के विषय में क्या सोचेंगी? और यदि उससे भक्तिहीनों की दृष्टि में, या दूसरी कलीसियाओं की दृष्टि में, उनकी कलीसिया या उनके पादरी पर निन्दा आने की सम्भावना हो, तो वे उसके विषय में व्याकुल हो जाते हैं। चाहे उससे कितनी ही भलाई क्यों न हो, या चाहे उससे कितने ही प्राण क्यों न बचें, वे नहीं चाहते कि कोई ऐसा काम किया जाए जिससे उनकी कलीसिया की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचे।
20. इस प्रकार के लोग कभी भी सिद्ध भक्ति के पक्ष में जनमत बनाने का लक्ष्य नहीं रखते।
परमेश्वर और मनुष्य के सच्चे मित्र सदा जनमत बनाने का, और जिन-जिन बातों में वह गलत है उन सब में उसे सुधारने का लक्ष्य रखते हैं। वे अपने सम्पूर्ण मन से संसार की सब बुराइयों को खोज निकालने, और संसार का सुधार करने, और पृथ्वी पर से अधर्म को दूर भगाने में लगे रहते हैं। दूसरे प्रकार के लोग सदा जनमत जैसा है वैसे ही उसके पीछे चलते हैं, और धारा का रुख टटोलते रहते हैं ताकि उसी ओर चलें, और हर उस बात से पीछे हटते हैं जो
