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पद के लिए उतने ही उतावले रहते हैं जितने कोई दूसरे? संसार तो मूर्ख ही होगा यदि वह ऐसे प्रमाण पर मन के परिवर्तन पर विश्वास करे।
8. मसीहियों को राजनीति में संसार के सदृश बनना छोड़ देना चाहिए, इस कारण भी कि ऐसे आचरण का संसार पर क्या प्रभाव पड़ेगा। मान लीजिए कि मसीही इस विषय में पूरी तरह विवेकपूर्ण और सुसंगत रीति से काम करें, और कहें, “हम किसी ऐसे मनुष्य को पद के लिए अपना मत नहीं देंगे, जब तक वह परमेश्वर का भय न मानता हो और लोगों पर धार्मिकता से शासन न करे।” तब भक्तिहीन लोग ऐसे मनुष्यों को उम्मीदवार नहीं बनाएँगे जो स्वयं व्यवस्था की अवहेलना करते हैं। नहीं।
हर एक उम्मीदवार को यह दिखाना पड़ेगा कि वह ऊँचे उद्देश्यों से काम करने को तैयार है, और कि वह देश को समृद्ध बनाने, सद्गुण को बढ़ावा देने, बुराई, अत्याचार और अव्यवस्था को दबाने, और लोगों को सुखी और पवित्र बनाने के लिए जो कुछ उससे हो सके वह सब करने में अपने आप को लगा देगा! यह दिखाना कि परमेश्वर और मनुष्य का प्रेम ही वह उद्देश्य है जो मसीहियों के सामने है, बेईमान राजनीतिज्ञों को लज्जित कर देगा। और एक आशीषित प्रभाव लहर की नाईं सारे देश पर फैल जाएगा।
IV. अब मुझे उन कुछ आपत्तियों का उत्तर देना है जो यहाँ प्रस्तुत किए गए सिद्धान्तों के विरुद्ध उठाई जाती हैं।
1. व्यापार के विषय में।
आपत्ति। “यदि हम उन्हीं सिद्धान्तों पर व्यापार न करें जिन पर भक्तिहीन लोग करते हैं, तो हम उनसे होड़ नहीं कर सकते, और संसार का सारा व्यापार भक्तिहीनों के हाथ में चला जाएगा। यदि हम दूसरों की भलाई के लिए अपना व्यापार करें, यदि हम इस सिद्धान्त पर ख़रीदें और बेचें कि अपना धन नहीं, बल्कि उन लोगों का धन खोजें जिनके साथ हम व्यापार करते हैं, तो हम सांसारिक मनुष्यों के साथ होड़ में टिक नहीं सकते, और सारा व्यापार उन्हीं के हाथ लग जाएगा।”
तो फिर उन्हें ले लेने दीजिए। आप किसी छोटे धन्धे में अपने परिश्रम से अपना निर्वाह कर सकते हैं, और सारा व्यापार सांसारिक मनुष्यों को करने दीजिए।
“आपत्ति।” परन्तु तब सुसमाचार फैलाने के लिए हमें धन कहाँ से मिलेगा?”
एक पवित्र कलीसिया, जो सुसमाचार के सिद्धान्तों पर चले, उस सारे धन से भी अधिक तेज़ी से सुसमाचार फैला देगी जो कभी न्यू यॉर्क में था या कभी होगा। मुझे एक पवित्र कलीसिया दीजिए, जो संसार से ऊपर उठकर जीवन बिताए, और उद्धार का काम मसीही जगत के सारे धन की अपेक्षा कहीं अधिक तेज़ी से आगे बढ़ेगा।
आपत्ति। “परन्तु शिक्षित सेवकाई को तैयार करने के लिए हमें बहुत सा धन ख़र्च करना पड़ेगा।”
आह! यदि हमारे पास एक पवित्र सेवकाई होती, तो वह शिक्षित सेवकाई से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती। यदि सेवक पर्याप्त पवित्र होते, तो वे इतनी शिक्षा के बिना भी काम चला लेते। परमेश्वर न करे कि मैं शिक्षित सेवकाई का मूल्य कम आँकूँ। सेवक जितनी अच्छी शिक्षा पा सकें, पाएँ; जितनी अधिक हो उतना ही अच्छा, बशर्ते वे पर्याप्त पवित्र हों। परन्तु यह सोचना निरा ढोंग है कि केवल विद्वान सेवकाई संसार का मन फिरा सकती है। सेवकों में प्रार्थना की आत्मा हो, उन पर पवित्र आत्मा का बपतिस्मा हो, तो वे सुसमाचार फैला देंगे। बस इतना हो कि
