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शर्त के रूप में सिद्धता की माँग नहीं करता। परन्तु व्यवस्था के दायित्व का कोई भी भाग समाप्त नहीं किया गया। सुसमाचार उन लोगों को जो उसके अधीन हैं, उसी पवित्रता के लिए उत्तरदायी ठहराता है जिसके लिए व्यवस्था के अधीन लोग उत्तरदायी हैं।
2. मेरा तर्क है कि मसीही सिद्धता एक कर्तव्य है, क्योंकि परमेश्वर को इससे कम कुछ भी माँगने का अधिकार नहीं है।
परमेश्वर हमें सिद्ध होने के दायित्व से, जैसी मैंने सिद्धता की परिभाषा दी है, मुक्त नहीं कर सकता।
यदि वह ऐसा करने का प्रयत्न करे, तो वह ठीक उतनी ही मात्रा में पाप करने की छूट दे देगा। उसे ऐसी कोई छूट देने का अधिकार नहीं है। जब तक हम नैतिक प्राणी हैं, विश्व में कोई ऐसी शक्ति नहीं जो हमें सिद्ध होने के दायित्व से मुक्त कर सके। क्या परमेश्वर हमें इस दायित्व से मुक्त कर सकता है कि हम उससे अपने सारे मन, और सारे प्राण, और सारी बुद्धि, और सारी शक्ति से प्रेम करें? इसका अर्थ यह कहना होगा कि परमेश्वर ऐसे प्रेम के योग्य नहीं है। और यदि वह हमें सारी व्यवस्था से मुक्त नहीं कर सकता, तो उसी कारण से वह उसके किसी भाग से भी मुक्त नहीं कर सकता।
3. यदि कोई यह तर्क करे कि सुसमाचार व्यवस्था से कम पवित्रता की माँग करता है, तो मैं उससे कहूँगा कि वह ठीक-ठीक बताए कि वह कितनी कम माँग करता है।
यदि हमें सिद्ध आज्ञापालन से पहले ही रुक जाने की अनुमति है, तो हम कहाँ रुकें? हमसे कितना सिद्ध होने की माँग है? बाइबल में आपको ऐसा कोई नियम कहाँ मिलेगा जो यह निर्धारित करे कि सुसमाचार के अधीन आपको व्यवस्था के अधीन की अपेक्षा कितना कम पवित्र होने की अनुमति है? क्या हम कहें कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने लिए स्वयं निर्णय करना चाहिए? तो मैं पूछता हूँ, क्या आप सोचते हैं कि जितने सिद्ध आप अभी हैं, उससे अधिक सिद्ध होना आपका कर्तव्य है? सम्भवतः सब कहेंगे, हाँ। क्या आप कोई ऐसा बिन्दु ठहरा सकते हैं जिस पर पहुँचकर आप कह सकें, “अब मैं पर्याप्त सिद्ध हूँ; यह सच है कि मुझमें कुछ पाप बचा है, परन्तु इस संसार में जितनी दूर जाना मेरा कर्तव्य है, उतनी दूर मैं जा चुका हूँ?” ऐसी किसी धारणा के लिए आपको अधिकार कहाँ से मिलता है? नहीं; सच्चाई यह है कि जितने लोग सचमुच भक्त हैं, वे जितने अधिक भक्त होते हैं, उतनी ही अधिक प्रबलता से वे सिद्ध होने के दायित्व को अनुभव करते हैं, जैसा परमेश्वर सिद्ध है।
IV. अब मैं यह दिखाऊँगा कि मसीही सिद्धता इस जीवन में प्राप्य, अर्थात् व्यवहार्य, है।
1. इस तथ्य से कि इसकी आज्ञा दी गई है, उचित रूप से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि मसीही सिद्धता प्राप्य है।
क्या परमेश्वर हमें आज्ञा देता है कि हम वैसे ही सिद्ध हों जैसा वह सिद्ध है, और फिर भी क्या हम कहेंगे कि यह असम्भव है? जब परमेश्वर किसी बात की आज्ञा देता है, तो क्या हमें सदा यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि जिस बात की वह आज्ञा देता है उसे करने की स्वाभाविक सम्भावना है? मुझे स्मरण है कि मैंने एक व्यक्ति को यह कहते सुना था कि वह पापियों को यह प्रचार करेगा कि उन्हें पश्चाताप करना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर इसकी आज्ञा देता है; परन्तु वह यह प्रचार नहीं करेगा कि वे पश्चाताप कर सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर ने कहीं नहीं कहा कि वे कर सकते हैं। कैसा घोर खिलवाड़! मान लीजिए कोई मनुष्य कहे कि वह नागरिकों को यह प्रचार करेगा कि उन्हें देश के नियमों का पालन करना चाहिए, क्योंकि सरकार ने उन्हें बनाया है, परन्तु वह उन्हें यह नहीं बताएगा कि वे उनका पालन कर सकते हैं, क्योंकि विधि-संहिता में कहीं यह नियम नहीं बनाया गया कि उनमें यह योग्यता है। सदा यही समझना चाहिए कि जब परमेश्वर मनुष्यों से किसी बात की माँग करता है, तो उनमें उसे करने के लिए आवश्यक क्षमताएँ होती हैं। अन्यथा परमेश्वर मृत्यु-दण्ड की धमकी के साथ हमसे असम्भव बातों की माँग करता है, और पापियों को उस काम को न करने के कारण नरक में भेजता है जिसे करने में वे किसी भी अर्थ में समर्थ नहीं थे।
2. यह कि सिद्ध होने की स्वाभाविक योग्यता है, एक सीधा-सादा तथ्य है।
