व्याख्यान 202 (253 में से)

सारी पृथ्वी को भर देगा, क्या है, यदि वह यह नहीं दिखाता कि संसार में परमेश्वर के प्रेम की

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सारी पृथ्वी को भर देगा, क्या है, यदि वह यह नहीं दिखाता कि संसार में परमेश्वर के प्रेम की सार्वभौमिक विजय अभी होनी है?

6. यदि इस संसार में पूर्ण पवित्रीकरण प्राप्य नहीं है, तो यह या तो सुसमाचार में प्रेरक कारणों के अभाव के कारण होगा, या परमेश्वर के आत्मा में पर्याप्त सामर्थ के अभाव के कारण।

कहा जाता है कि दूसरे जीवन में हम परमेश्वर के समान होंगे, क्योंकि उसको वैसा ही देखेंगे जैसा वह है। परन्तु यहाँ क्यों नहीं, यदि हममें वह विश्वास है जो “आशा की हुई वस्तुओं का निश्चय, और अनदेखी वस्तुओं का प्रमाण है?” उन लोगों के लिए जो “धर्म के भूखे और प्यासे हैं” यह प्रतिज्ञा है कि “वे तृप्त किए जाएँगे।”

धार्मिकता से “तृप्त” किए जाने का अर्थ पूर्ण रूप से पवित्र होने के सिवाय और क्या है? और क्या हम मरने तक कभी धार्मिकता से तृप्त न किए जाएँगे? क्या हमें सारा जीवन भूखे, और प्यासे और असन्तुष्ट ही बिताना है? बाइबल को इसी प्रकार समझा गया है, परन्तु वह ऐसा नहीं कहती।

आपत्तियाँ 1. “आदत की शक्ति इतनी बड़ी है, कि हमें इस जीवन में पूर्ण रूप से पवित्र किए जाने की आशा नहीं रखनी चाहिए।”

उत्तर। यदि आदत की शक्ति पर इतना आघात किया जा सकता है कि एक पश्चाताप न करनेवाले पापी का मन-परिवर्तन हो सके, तो वह पूरी तरह क्यों नहीं तोड़ी जा सकती, ताकि एक मन-परिवर्तित व्यक्ति पूर्ण रूप से पवित्र किया जा सके? निश्चय ही सबसे बड़ी कठिनाई तब होती है जब स्वार्थ का मन पर पूरा नियंत्रण होता है, और जब पाप की आदतें बिलकुल भी टूटी नहीं होतीं। यह बाधा हर स्थिति में इतनी बड़ी होती है कि पवित्र आत्मा की सामर्थ के सिवाय और कोई सामर्थ उस पर जय नहीं पा सकती: और बहुत से उदाहरणों में इतनी बड़ी होती है कि परमेश्वर स्वयं, अपनी बुद्धि के अनुरूप रहते हुए, प्राण का मन-परिवर्तन करने के लिए आवश्यक साधनों का प्रयोग नहीं कर सकता। परन्तु क्या यह सोचना सम्भव है कि जब वह उस पर जय पाना आरम्भ कर चुका है, जब वह स्वार्थ की शक्ति और आदत के हठ को तोड़ चुका है, और वास्तव में उस व्यक्ति का मन-परिवर्तन कर चुका है, तो इसके बाद परमेश्वर के पास प्राण को पूरी तरह पवित्र करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं?

2. “पाप के जीवन ने बहुत सी शारीरिक कठिनाइयाँ उत्पन्न कर दी हैं, जिन पर नैतिक साधनों के द्वारा जय नहीं पाई जा सकती और न उन्हें दूर किया जा सकता है।”

यह एक सामान्य आपत्ति है। मनुष्य अनुभव करते हैं कि उन्होंने अपने ऊपर ऐसी भूखें और शारीरिक प्रभाव बाँध लिए हैं, जिन पर नैतिक साधनों के द्वारा जय पाना वे सम्भव नहीं मानते।

प्रेरित पौलुस रोमियों के 7वें अध्याय में एक ऐसे मनुष्य का वर्णन करता है जो देह के साथ बड़े संघर्ष में है। परन्तु अगले अध्याय में वह एक ऐसे व्यक्ति की बात करता है जिसने शरीर पर विजय पा ली थी। “और यदि मसीह तुम में है, तो देह पाप के कारण मरी हुई है; परन्तु आत्मा धर्म के कारण जीवित है। और यदि उसी का आत्मा जिस ने यीशु को मरे हुओं में से जिलाया तुम में बसा हुआ है; तो जिस ने मसीह को मरे हुओं में से जिलाया, वह तुम्हारी मरनहार देहों को भी अपने आत्मा के द्वारा जो तुम में बसा हुआ है जिलाएगा।” देह का यह जिलाया जाना देह के पुनरुत्थान के विषय में नहीं कहा गया, वरन् देह पर परमेश्वर के आत्मा के प्रभाव के विषय में, अर्थात् देह के पवित्रीकरण के विषय में।

आप पूछेंगे, “क्या परमेश्वर का आत्मा देह में शारीरिक परिवर्तन उत्पन्न करता है?” मैं इसे एक पियक्कड़ के उदाहरण से समझाऊँगा। पियक्कड़ ने अपने ऊपर देह की एक रोगग्रस्त दशा ला दी है, एक अस्वाभाविक प्यास, जो अनुचित है, और इतनी प्रबल है कि ऐसा लगता है कि उसका सुधरना असम्भव है। परन्तु बहुत सम्भव है कि आप ऐसे उदाहरण जानते हों जिनमें वे

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