व्याख्यान 84 (253 में से)

फ़ैशन की वस्तुओं पर किसी प्रकार का भरोसा नहीं रखते, और उन्हें कुछ भी मूल्य नहीं देते, बल्कि उन्हें तुच्छ जानते और

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फ़ैशन की वस्तुओं पर किसी प्रकार का भरोसा नहीं रखते, और उन्हें कुछ भी मूल्य नहीं देते, बल्कि उन्हें तुच्छ जानते और पूरी तरह उनकी उपेक्षा करते हैं। परन्तु जब तक आप निराले न हों, जब तक आप अपने आप को संसार के फ़ैशनों से अलग न करें, तब तक आप यही दिखाते हैं कि आप उन्हें मूल्यवान समझते हैं। संसार के फ़ैशनों के विरुद्ध अपने जीवन से उचित गवाही देने का सादे वस्त्र पहनने के सिवा और कोई मार्ग नहीं है। मेरा यह अर्थ नहीं कि आप जान-बूझकर निराला दिखने का यत्न करें, बल्कि यह कि आप सुविधा और मितव्ययिता का ध्यान रखें, चाहे इससे आप निराले ही क्यों न दिखें।

आपत्ति। “परन्तु यदि हम सादे वस्त्र पहनेंगे, तो लोगों का ध्यान उसी पर जाएगा।”

इसका कारण यह है कि इतने थोड़े लोग ऐसा करते हैं कि यह एक नई बात लगती है, और जब लोग किसी अंगीकार करनेवाले मसीही को इतना कठोर देखते हैं कि वह फ़ैशनों की परवाह नहीं करता, तो हर कोई उसे घूरने लगता है। सब ऐसा करने लगें, तो इससे आप केवल यही दिखाएँगे कि आप मसीही हैं, और नहीं चाहते कि आपको भक्तिहीनों के साथ मिला-जुला समझा जाए। यदि संसार के सारे मसीही एक होकर उसके व्यर्थ दिखावे के विरुद्ध व्यावहारिक गवाही दें, तो क्या इसका संसार के घमण्ड पर प्रभाव न पड़ेगा?

आपत्ति। “परन्तु इस रीति से आप धर्म को जनसाधारण से बहुत दूर ले जाते हैं। अच्छा यही है कि कलीसिया और संसार के बीच कोई बनावटी भेद खड़ा न किया जाए।”

सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। आप कलीसिया को संसार के जितना निकट ले आते हैं, उतना ही आप उन कारणों को मिटा देते हैं जो संसार की दृष्टि के सामने स्पष्ट रूप से खड़े रहने चाहिए, ताकि वे पक्ष बदलें और कलीसिया की ओर चले आएँ।

जब तक आप सीधे उनके बीच से निकल न आएँ, और यह न दिखाएँ कि आप किसी भी बात में उनमें से नहीं हैं, और कलीसिया को इतना दूर न ले जाएँ कि पवित्र लोगों और पापियों के बीच एक चौड़ा अन्तर हो, तब तक आप भक्तिहीनों को यह कैसे अनुभव करा सकते हैं कि इतना बड़ा परिवर्तन आवश्यक है?

आपत्ति। “परन्तु जो परिवर्तन आवश्यक है वह तो मन का परिवर्तन है।”

सच है; परन्तु क्या मन का परिवर्तन जीवन में परिवर्तन उत्पन्न नहीं करेगा?

आपत्ति। “आप लोगों के मसीही बनने के मार्ग में रुकावटें डाल देंगे। बहुत से प्रतिष्ठित लोग धर्म से घृणा करने लगेंगे, और यदि उन्हें अपनी इच्छानुसार पहनने-ओढ़ने के साथ मसीही बनने की अनुमति न मिले, तो वे पूरी तरह संसार की ओर ही चले जाएँगे।”

यह उतना ही तर्कसंगत है जितना किसी संयमी मनुष्य का यह सोचना कि उसे कभी-कभार नशे में धुत होना ही चाहिए, ताकि पियक्कड़ों को उससे घृणा न हो और उन पर उसका प्रभाव बना रहे। सच्चाई यह है कि लोगों को यह जानना चाहिए, और अंगीकार करनेवाले

मसीहियों के जीवन में यह देखना चाहिए कि यदि वे धर्म को अपनाते हैं, तो उन्हें संसार से छुड़ाया जाना होगा, और संसार के प्रेम को, और उसके घमण्ड, दिखावे और मूर्खता को छोड़ना होगा, और जागरूकता, आत्म-त्याग और सक्रिय परोपकार के साथ पवित्र जीवन बिताना होगा।

आपत्ति। “क्या हमारे लिए यह अच्छा नहीं कि हम इस बात की पूरी तरह उपेक्षा करें, और ऐसी छोटी-छोटी बातों पर कोई ध्यान न दें, और उन्हें अपने ढंग से चलने दें; टोपियाँ बनानेवाली और गाउन सिलनेवाली जैसा चाहें वैसा करें, और हम उस समाज की रीतियों पर, जिसमें हम रहते हैं, और उस मण्डल की रीतियों पर, जिसमें हम उठते-बैठते हैं, चलते रहें?”

क्या संसार के फ़ैशनों के प्रति तिरस्कार दिखाने का यही तरीका है? क्या लोग किसी वस्तु के प्रति तिरस्कार दिखाने के लिए साधारणतः यही मार्ग अपनाते हैं कि उसी का पालन करें? वाह, संसार के प्रति अपनी

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