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कहेंगे, वह जानता है कि उसे मरना है। परन्तु मैं कहता हूँ, जब तक वह इस दशा में है, वह वास्तव में विश्वास नहीं करता कि वह कभी मरेगा। यह विषय उसके विचारों के सामने है ही नहीं। और इसलिए उसकी पूरी विचारहीनता में यह असम्भव है कि वह इस पर विश्वास करे। उससे पूछिए कि क्या वह कभी मरने की आशा रखता है, तो वह उत्तर देगा, “ओ हाँ, मैं जानता हूँ कि मुझे मरना है; सब मनुष्य नश्वर हैं।”
जैसे ही वह अपने विचार उसकी ओर लगाता है, वह सत्य को मान लेता है। और यदि आप उस निश्चय को उसके मन पर तब तक जमा सकें जब तक उस पर उसकी वास्तविक और स्थायी छाप न पड़ जाए, तो वह अचूक रूप से अपना आचरण बदल देगा, और इस संसार के बदले दूसरे संसार के लिए जीएगा। धर्म में भी ठीक ऐसा ही है; मनुष्य जिस बात पर वास्तव में विश्वास करता है, वह उसके आचरण को उतनी ही निश्चितता से नियंत्रित करेगी जितनी निश्चितता से इच्छा आचरण को चलाती है।
5. कलीसिया ने लम्बे समय से बहुत अधिक एंटीनोमियन नीति पर काम किया है।
वह अधिक अमूर्त सिद्धान्तों के लिए तो हठ करती रही है, और अधिक व्यावहारिक सिद्धान्तों को बहुत अधिक दृष्टि से ओझल कर दिया है। उसने उन सिद्धान्तों में, जो व्यावहारिक नहीं हैं, सही सिद्धान्तवादिता पर उन सिद्धान्तों की अपेक्षा अधिक बल दिया है जो व्यावहारिक हैं। कलीसिया के विश्वास-वचनों को देखिए, और देखिए कि वे सब किस प्रकार मुख्य बल उन सिद्धान्तों पर देते हैं जिनका हमारे आचरण से बहुत कम सम्बन्ध है। कोई मनुष्य आचरण की बातों में सबसे बड़ा विधर्मी हो सकता है, बशर्ते वह खुल्लमखुल्ला अधर्मी और दुराचारी न हो, फिर भी वह कलीसिया में अच्छी प्रतिष्ठा बनाए रख सकता है, चाहे उसका जीवन सुसमाचार के अनुरूप हो या न हो। क्या यह भयानक नहीं है? और इसी कारण हम देखते हैं कि जब आचरण-सम्बन्धी भूलों के विषय में कलीसिया को शुद्ध करने का प्रयत्न किया जाता है, तो वह उसे सह नहीं पाती। नहीं तो इसका और क्या कारण है कि कलीसिया को मदिरा के असंयम, और सब्त (विश्रामदिन) तोड़ने, और दास-प्रथा के पापों में भागीदारी से मुक्त करने के प्रयत्न पर इतनी उत्तेजना उत्पन्न होती है? कलीसिया को संसार के मन-परिवर्तन के लिए कोई प्रभावशाली काम करने को प्रेरित करना इतना कठिन क्यों है? ओह, कलीसिया कब शुद्ध होगी, या संसार का मन-परिवर्तन कब होगा? तब तक नहीं जब तक यह बात पक्की न हो जाए कि आचरण में विधर्म विश्वास में विधर्म का प्रमाण है। तब तक नहीं जब तक कोई मनुष्य प्रतिदिन अपने आचरण में सारे सुसमाचार का इन्कार करते हुए भी एक अच्छे मसीही के रूप में कलीसिया में अपनी प्रतिष्ठा बनाए रख सकता है।
6. देखिए, एक पादरी अपनी मंडली की दशा के विषय में किस प्रकार धोखा खा सकता है।
वह उन अमूर्त सिद्धान्तों पर बहुत प्रचार करता है जिनका आचरण से सीधा सम्बन्ध नहीं है, और उसके लोग कहते हैं कि उनका पोषण होता है, और वे उसमें आनन्दित होते हैं, और वह सोचता है कि वे अनुग्रह में बढ़ रहे हैं, जबकि वास्तव में यह इस बात का कोई निश्चित चिह्न नहीं कि उनके बीच कोई धर्म है भी। स्पष्ट है कि यह कोई निश्चित प्रमाण नहीं है। परन्तु यदि, जब वह व्यावहारिक सिद्धान्तों का प्रचार करता है, उसके लोग यह दिखाते हैं कि वे सत्य से अपने सम्बन्ध में प्रेम करते हैं, और उस पर चलकर इसे दिखाते हैं, तब वे सत्य के प्रति वास्तविक प्रेम का प्रमाण देते हैं।
यदि कोई पादरी यह पाए कि उसके लोगों को अमूर्त सैद्धान्तिक प्रचार प्रिय है, परन्तु जब वह व्यावहारिक सिद्धान्तों पर जोर देने लगता है तो वे विद्रोह करते हैं, तो वह निश्चित हो सकता है कि यदि उनमें कोई धर्म है भी, तो वह निम्न दशा में है; और यदि वह उचित परख के बाद यह पाए कि वह उन्हें इस स्तर तक नहीं उठा सकता कि वे व्यावहारिक सिद्धान्त को ग्रहण करें, तो वह सन्तुष्ट हो सकता है कि उनमें धर्म का एक कण भी नहीं है, बल्कि वे केवल एंटीनोमियनों का एक समूह हैं, जो सोचते हैं कि वे अमूर्त सही सिद्धान्तवादिता में एक मरे हुए विश्वास के सहारे स्वर्ग जा सकते हैं।
