व्याख्यान 8 (253 में से)

यह स्वयंसिद्ध है कि यदि आपने यह नहीं किया है, तो आप परमेश्वर की सेवा नहीं कर रहे। मान लीजिए

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अध्याय 2: झूठे अंगीकार करनेवाले।

यह स्वयंसिद्ध है कि यदि आपने यह नहीं किया है, तो आप परमेश्वर की सेवा नहीं कर रहे। मान लीजिए कोई सज्जन अपनी दुकान की देखभाल के लिए एक मुंशी को नौकर रखे, और मान लीजिए वह मुंशी अपना ही काम-धन्धा देखता रहे, और जब उससे अपने स्वामी के लिए, जो उसे वेतन देता है, आवश्यक काम करने को कहा जाए, तो वह उत्तर दे,

“सच में मुझे अपना ही इतना काम देखना है कि मेरे पास इन कामों के लिए समय नहीं है;” तो क्या हर कोई ऐसे सेवक के विरुद्ध चिल्ला न उठेगा, और यह न कहेगा कि वह अपने स्वामी की सेवा बिलकुल नहीं कर रहा, उसका समय उसका अपना नहीं है, उसका मूल्य चुकाया जा चुका है, और वह केवल अपनी ही सेवा कर रहा था? इसी प्रकार जहाँ किसी मनुष्य ने केवल विचार में ही नहीं, बल्कि व्यवहार में अपने ऊपर अपने स्वामित्व का त्याग नहीं किया है, उसने धर्म का पहला पाठ भी नहीं सीखा। वह प्रभु की सेवा नहीं कर रहा, बल्कि अपने देवताओं की सेवा कर रहा है।

2. जो मनुष्य उस काम-धन्धे को, जिसमें वह लगा है, अपने धर्म का एक भाग नहीं बनाता, वह परमेश्वर की सेवा नहीं करता।

कभी-कभी आप किसी मनुष्य को यह कहते सुनते हैं, मैं सारे दिन संसार में, या सांसारिक काम-धन्धे में, इतना व्यस्त रहता हूँ कि मेरे पास परमेश्वर की सेवा करने के लिए समय नहीं है। वह सोचता है कि वह सुबह थोड़ी देर परमेश्वर की सेवा कर लेता है, और फिर अपने सांसारिक काम-धन्धे में लग जाता है। आप निश्चय जानिए, उस मनुष्य ने अपना धर्म वहीं छोड़ दिया जहाँ उसने अपनी प्रार्थनाएँ कहीं। शायद वह नाश्ते से पहले का समय, अपने काम पर जाने की तैयारी करने से पहले का समय, परमेश्वर को देने के लिए तैयार है; परन्तु जैसे ही वह पूरा हुआ, वह अपने काम पर चल देता है। शायद वह इतना तो प्रभु का भय मानता है कि रात और सुबह अपनी प्रार्थनाएँ कर ले, परन्तु वह अपने देवताओं की सेवा करता है। उस मनुष्य का धर्म नरक के लिए ठट्ठे का विषय है!

वह बड़ी भक्ति से प्रार्थना करता है, और फिर परमेश्वर के लिए अपने काम-धन्धे में लगने के बदले वह अपनी ही सेवा करता है। निःसन्देह मूर्तियाँ इस व्यवस्था से भली-भाँति सन्तुष्ट हैं, परन्तु परमेश्वर पूरी तरह अप्रसन्न है।

3. परन्तु फिर: आप में से वे लोग अपने देवताओं की सेवा कर रहे हैं जो यहोवा को वह अर्पण करते हैं जिसमें आपका थोड़ा या कुछ भी खर्च नहीं होता।

बहुत से लोग हैं जो धर्म को भक्ति के कुछ ऐसे कामों में निहित मानते हैं जो उनके स्वार्थ में बाधा नहीं डालते। आप सुबह अपने परिवार में प्रार्थना करते हैं, क्योंकि तब आप यह बड़ी सुविधा से कर सकते हैं, परन्तु आप यहोवा की सेवा को अपने देवताओं की सेवा में बाधा डालने नहीं देते, या अपने धनी बनने, या संसार का आनन्द उठाने के मार्ग में आड़े आने नहीं देते। जिन देवताओं की आप सेवा करते हैं, वे यहोवा की सेवा के कारण उपेक्षित या तिरस्कृत किए जाने की कोई शिकायत नहीं करते।

4. वह सारा वर्ग अपने देवताओं की सेवा कर रहा है जो यह समझता है कि सप्ताह के छः दिन उनके अपने हैं, और केवल सब्त ही परमेश्वर का दिन है।

बहुत से लोग यह समझते हैं कि सप्ताह मनुष्य का समय है, और केवल सब्त परमेश्वर का, और यह कि उन्हें सप्ताह भर अपना काम करने, और अपनी सेवा करने, और अपने हितों को बढ़ाने का अधिकार है, बशर्ते वे केवल सब्त को कड़ाई से मानें, और सब्त के दिन

परमेश्वर की सेवा करें। उदाहरण के लिए: एक प्रसिद्ध प्रचारक ने सब्त तोड़ने की दुष्टता को समझाते हुए यह दृष्टान्त दिया: “मान लीजिए किसी मनुष्य की जेब में सात डॉलर

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