व्याख्यान 212 (253 में से)

यह है कि जहाँ विश्वास और प्रेम क्रियाशील नहीं होते, वहाँ लोग जितना अधिक बाहरी

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यह है कि जहाँ विश्वास और प्रेम क्रियाशील नहीं होते, वहाँ लोग जितना अधिक भीतरी जीवन के बिना बाहरी कार्यों में बढ़-चढ़कर लगे रहते हैं, उतना ही वे कठोर और ठण्डे, और अधर्म से भरे हो जाते हैं। सम्भव है कि उनका मन-परिवर्तन हुआ हो परन्तु वे पीछे हट गए हों; और जब तक वे इस प्रकार अपने धार्मिक कर्तव्यों को बढ़ाकर, लगातार चलनेवाली सभाओं में इधर-उधर दौड़कर, या बिना किसी आत्मिक जीवन के पापियों को चेतावनी देकर पवित्रीकरण को खोजते रहेंगे, तब तक वे उसे कभी नहीं पाएँगे, बल्कि वास्तव में और अधिक कठोर और जड़ हो जाएँगे। या यदि वे इस प्रकार किसी उत्तेजना में आ भी जाएँ, तो वह मन की एक नकली और ऊपरी दशा होती है, जिसमें कुछ भी पवित्र नहीं होता।

II. इतने सारे लोगों के पवित्र न किए जाने का एक और कारण यह है: वे मसीह को उसके सब सम्बन्धों में ग्रहण नहीं करते, जैसा कि वह सुसमाचार में प्रस्तुत किया गया है।

अधिकांश लोग यहाँ पूरी तरह भूल में हैं, और वे पवित्रीकरण में तब तक कभी आगे नहीं बढ़ेंगे, जब तक वे यह न सीख लें कि जिस ढंग से वे उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, उसमें एक मूलभूत भूल है। एक उदाहरण लीजिए: मान लीजिए किसी व्यक्ति को पाप का बोध हो गया है। वह देखता है कि परमेश्वर न्याय के अनुसार उसे नरक में भेज सकता है, और उसके पास कोई ऐसा मार्ग नहीं जिससे वह उसकी भरपाई कर सके। अब उसे मसीह के प्रायश्चित के विषय में बताइए, उसे दिखाइए कि मसीह भरपाई करने के लिए कैसे मरा, ताकि परमेश्वर आप ही धर्मी ठहरे, और जो यीशु पर विश्वास करें उनका भी धर्मी ठहरानेवाला हो; वह देखता है कि यह ठीक और पर्याप्त है, और ठीक वही है जिसकी उसे आवश्यकता है, और वह धर्मी ठहराए जाने के लिए विश्वास के साथ अपने आप को मसीह पर डाल देता है। वह उसे अपने धर्मी ठहराए जाने के रूप में ग्रहण करता है, और सुसमाचार को वह बस यहीं तक समझता है। वह विश्वास करता है, और धर्मी ठहराया जाता है, और अपने पापों की क्षमा का अनुभव करता है।

अब, यही वह स्थिति है जहाँ पाप का बोध पाए हुए अधिकांश पापी रुक जाते हैं। वे मसीह को उसी रूप में अपना लेते हैं जिस रूप में, पापी होने के नाते, उन्हें उद्धारकर्ता की सबसे अधिक आवश्यकता अनुभव होती है, अर्थात् अपने पापों के प्रायश्चित-बलि के रूप में, जो प्रायश्चित करे और क्षमा दिलाए; और वहीं वे रुक जाते हैं। और उसके बाद बहुधा उनका ध्यान उस ओर ले जाना अत्यन्त कठिन होता है जो मसीह इससे आगे प्रस्तुत करता है।

मसीह के विषय में, कि वह विश्वासी का ज्ञान और धार्मिकता और उसका पवित्रीकरण है, और पाप से बचानेवाले उद्धारकर्ता के रूप में उसके सब सम्बन्धों के विषय में, आप चाहे जो कहें, वे उसकी आवश्यकता को इतना अनुभव नहीं करते कि सचमुच इन सम्बन्धों में अपने आप को उस पर डाल दें। नया विश्वासी परमेश्वर के साथ मेल का अनुभव करता है, आनन्द और कृतज्ञता उसके हृदय को भर देते हैं, वह इस बात से आनन्दित होता है कि उसे एक ऐसा उद्धारकर्ता मिल गया है जो उसके और उसके न्यायी के बीच खड़ा हो सकता है; सम्भव है कि वह सचमुच अधीन हो गया हो, और कुछ समय तक वह परमेश्वर की आज्ञाओं के पालन के मार्ग में चलता भी रहे। परन्तु आगे चलकर वह अपने अंगों में पाप की क्रियाओं को, अदमित घमण्ड को, अपने पुराने स्वभाव के फूट निकलने को, और भीतर और बाहर से अपने प्राण पर आक्रमण करते हुए बहुत-से शत्रुओं को पाता है, और वह उनका सामना करने के लिए तैयार नहीं होता।

अब तक उसने मसीह को मुख्य रूप से उसके केवल एक सम्बन्ध में अपनाया और माना है, अर्थात् एक ऐसे उद्धारकर्ता के रूप में जो उसे नरक से बचाए। यदि मैं भूल नहीं करता, तो मसीही होने का अंगीकार करनेवालों का बड़ा समूह उन अनेक अत्यन्त रोचक सम्बन्धों को लगभग पूरी तरह भुला बैठता है जो मसीह विश्वासियों के साथ रखता है। अब, जब नया विश्वासी अपने आप को इस प्रकार परीक्षा की शक्ति के अधीन पाता है, और पाप में खिंच जाता है, तो उसे मसीह को एक नए सम्बन्ध में ग्रहण करने की आवश्यकता है, ताकि वह उसके प्रावधान की व्यापकता के विषय में और अधिक जाने, उसके पास फिर से नई रीति से जाए, और परीक्षा का सामना करने के लिए अपने मन को नई प्रेरणा दे। बहुत-से मसीही इसे पूरी तरह नहीं समझते। वे

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