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अपने आप को सुख पहुँचाने के काम में लगाते हैं, बजाय इसके कि वे दूसरों को आशीष देने में अपने आप को खपा दें।
धर्म का अंगीकार करनेवालों के इन दो वर्गों को कौन नहीं जानता? एक सदा ऐसे लोगों को खोजता रहता है जिनका वह भला करे, दूसरा सदा अपने लिए भलाई पाने का प्रयत्न करता रहता है। एक देने के लिए उत्सुक है, दूसरा पाने के लिए। एक भला करने के लिए, दूसरा भला पाने के लिए। चरित्र के ये दो वर्ग एक दूसरे के ठीक उतने ही विपरीत हैं जितने ज्योति और अंधकार।
19. यदि धर्म का अंगीकार करनेवालों का यह वर्ग दूसरों के मन-परिवर्तन और उद्धार के लिए प्रार्थना करने की ओर प्रेरित होता है, तो आप देखेंगे कि वे उसी प्रकार के विचारों से प्रेरित होते हैं जिनसे वे अपने लिए प्रार्थना करते समय प्रेरित होते हैं।
वे मुख्य रूप से स्वयं नरक से डरते हैं, और जब उन्हें गहरा बोध होता है, तो वे डरते हैं कि दूसरे भी वहाँ चले जाएँगे। वे अपने लिए सुख खोज रहे हैं, और जब स्वार्थ आड़े नहीं आता, तो वे दूसरों के लिए भी वही खोजते हैं। वे पापियों के लिए इसलिए प्रार्थना नहीं करते कि उन्हें उस पाप की बुराई का ऐसा गहरा एहसास है जो पापी कर रहे हैं, बल्कि इसलिए कि उन्हें उस नरक के आतंक का ऐसा एहसास है जिसकी ओर पापी जा रहे हैं। वे पापियों का मन-परिवर्तन इसलिए नहीं चाहते कि पापी
परमेश्वर का अनादर करते हैं, बल्कि इसलिए कि वे खतरे में हैं। प्रार्थना करने में उनका बड़ा उद्देश्य उन लोगों की सुरक्षा निश्चित करना है जिनके लिए वे प्रार्थना करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे धर्म में उनका बड़ा उद्देश्य अपनी सुरक्षा निश्चित करना है। वे अपने ऊपर तरस खाते हैं और दूसरों पर भी तरस खाते हैं। यदि कोई खतरा न होता, तो न अपने लिए और न दूसरों के लिए प्रार्थना करने का उनके पास कोई कारण होता।
परमेश्वर और मनुष्य के सच्चे मित्र भी पापियों के लिए करुणा अनुभव करते हैं, परन्तु वे परमेश्वर के आदर के लिए उससे कहीं अधिक अनुभव करते हैं। पापियों को नरक में जाते देखने की अपेक्षा परमेश्वर का अपमान और अनादर होते देखकर वे कहीं अधिक दुःखी होते हैं। और यदि ऐसा ही हो कि या तो परमेश्वर का सदा के लिए अनादर हो या मनुष्य नरक में जाएँ, तो—उतने ही निश्चय से जितने निश्चय से वे परमेश्वर से सर्वोपरि प्रेम करते हैं—वे यही निर्णय करेंगे कि परमेश्वर अपने उचित आदर से वंचित रहे, इसकी अपेक्षा पापी अनन्त यातनाओं में डूब जाएँ। और वे अपनी सच्ची भावनाओं को अपनी प्रार्थनाओं में प्रगट करते हैं। आप उन्हें पापियों के लिए ऐसे प्रार्थना करते सुनते हैं मानो वे परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोही हों, अनन्त क्रोध के योग्य दोषी अपराधी हों, परमेश्वर और समस्त सृष्टि के शत्रु हों; और जबकि वे पापियों के लिए करुणा से भरे होते हैं, वे धन्य परमेश्वर के प्रति उनके आचरण के कारण उनके विरुद्ध पवित्र क्रोध की ज्वाला भी अपने भीतर भड़कती हुई अनुभव करते हैं।
20. धर्म का अंगीकार करनेवालों का जिस वर्ग के विषय में मैं बोल रहा हूँ, वे संदेहों से बहुत परेशान रहने के आदी होते हैं।
वे अपने संदेहों के बारे में बहुत बातें करने के आदी होते हैं। उनके इतिहास का एक बड़ा भाग इसी से बना होता है—उनके संदेहों का विवरण। चूँकि उनके लिए बड़ी बात एक सुखद आशा का आनन्द लेना है, इसलिए ज्यों ही वे संदेह करने लगते हैं, उनका सब कुछ समाप्त हो जाता है, और इसलिए वे अपने संदेहों को लेकर बड़ा हंगामा मचाते हैं, और फिर वे धर्म के लिए कुछ भी करने को तैयार नहीं होते, क्योंकि उन्हें ये संदेह हैं। परमेश्वर और मनुष्य के सच्चे मित्र, जो भलाई करने में लगे रहते हैं, यदि शैतान कभी उन्हें यह सुझाए कि वे नरक में जा रहे हैं, तो पहला उत्तर जो उनके मन में आता है वह यह है, “यदि मैं जाऊँ भी तो क्या? बस, जब तक मैं कर सकता हूँ, मुझे पापियों को आग में से खींच निकालने दो।” मैं मानता हूँ कि सच्चे
मसीहियों को भी संदेह हो सकते हैं।
परन्तु वे जितना अधिक पापियों को बचाने पर पूरी तरह तुले होते हैं, उतना ही कम उन्हें संदेह होने की संभावना होती है। शैतान के लिए यह बहुत कठिन काम होगा कि वह ऐसी कलीसिया को, जो पूरी तरह
