व्याख्यान 89 (253 में से)

क्योंकि परमेश्वर-भक्ति का शोक ऐसा पश्चाताप उत्पन्न करता है जिसका परिणाम उद्धार है और फिर उससे पछताना नहीं पड़ता; परन्तु सांसारिक शोक उत्पन्न करता है

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अध्याय 9: सच्चा और झूठा पश्चाताप। “क्योंकि परमेश्वर-भक्ति का शोक ऐसा पश्चाताप उत्पन्न करता है जिसका परिणाम उद्धार है और फिर उससे पछताना नहीं पड़ता; परन्तु सांसारिक शोक मृत्यु उत्पन्न करता है।” 2 कुरिन्थियों 7:10।

इस अध्याय में प्रेरित एक दूसरी पत्री की ओर संकेत करता है जो उसने पहले कुरिन्थुस की कलीसिया को एक विशेष विषय पर लिखी थी, जिसमें वे बहुत दोषी थे। वह यहाँ उस प्रभाव के विषय में बोलता है जो उस पत्री का उन्हें सच्चे पश्चाताप तक लाने में पड़ा। उन्हें परमेश्वर-भक्ति का शोक हुआ। यही इस बात का प्रमाण था कि उनका पश्चाताप सच्चा था।

“सो देखो, इसी बात से कि तुम्हें परमेश्वर-भक्ति का शोक हुआ, तुम में कितनी उत्तेजना और प्रत्युत्तर और रिस, और भय, और लालसा, और धुन और पलटा लेने का विचार उत्पन्न हुआ! तुम ने सब प्रकार से यह सिद्ध कर दिखाया, कि तुम इस बात में निर्दोष हो।”

जिस पद को मैंने अपना मूल पाठ चुना है, उसमें वह पाप के लिए दो प्रकार के शोक की बात करता है — एक उद्धार के लिए पश्चाताप उत्पन्न करता है, दूसरा मृत्यु उत्पन्न करता है। वह उसी की ओर संकेत करता है जिसे साधारणतः दो प्रकार का पश्चाताप समझा जाता है। और आज रात के प्रवचन का विषय यही है।

सच्चा और झूठा पश्चाताप।

इस विषय पर बोलते हुए, मैं यह दिखाना चाहता हूँ, I. सच्चा पश्चाताप क्या है। II. उसे कैसे पहचाना जा सकता है। III. झूठा और नकली पश्चाताप क्या है। IV. उसे कैसे पहचाना जा सकता है।

अब बहुत समय हो गया है कि धर्म का अंगीकार करनेवालों को यह सिखाया जाए कि वे धर्म के विषय में होनेवाले विभिन्न अनुभवों के स्वभाव और चरित्र के सम्बन्ध में जितना अभी करते हैं उससे कहीं अधिक भेद करें। यदि ऐसा होता, तो कलीसिया झूठे और निष्फल अंगीकार करनेवालों से इतनी भरी न होती। हाल में मुझे बार-बार इस बात की जाँच करनी पड़ी है कि इतना नकली धर्म क्यों है, और मैंने यह जानने का प्रयत्न किया है कि इस कठिनाई की जड़ क्या है। यह बात सर्वविदित है कि बहुत से लोग अपने आप को धार्मिक समझते हैं जो वास्तव में वैसे नहीं हैं, जब तक कि बाइबल झूठी न हो। इतने लोग धोखा क्यों खाते हैं? इतने लोग, जो अब भी पश्चाताप न करनेवाले पापी हैं, यह धारणा क्यों बना लेते हैं कि उन्होंने पश्चाताप कर लिया है? इसका कारण निस्सन्देह यह है कि धर्म की नींव के विषय में भेद करनेवाली शिक्षा की कमी है, और विशेष करके सच्चे और झूठे पश्चाताप के बीच भेद करने की कमी है।

I. मुझे यह दिखाना है कि सच्चा पश्चाताप क्या है।

इसमें पाप के स्वभाव के विषय में विचार का परिवर्तन सम्मिलित है, और विचार के इस परिवर्तन के बाद पाप के प्रति भावना में भी उसके अनुरूप परिवर्तन आता है। भावना विचार का परिणाम है।

और जब विचार का यह परिवर्तन ऐसा हो कि भावना में भी उसके अनुरूप परिवर्तन उत्पन्न करे, यदि विचार सही हो और भावना उसके अनुरूप हो, तो यही सच्चा पश्चाताप है। विचार सही होना चाहिए। अब जो विचार अपनाया गया है वह अवश्य ऐसा होना चाहिए जैसा विचार परमेश्वर पाप के विषय में रखता है।

परमेश्वर-भक्ति का शोक, जैसा परमेश्वर चाहता है, पाप के विषय में ऐसे ही दृष्टिकोण से उत्पन्न होना चाहिए जैसा परमेश्वर का है।

पहला। पाप के विषय में विचार का परिवर्तन होना चाहिए।

1. पाप के स्वभाव के विषय में विचार का परिवर्तन।

जो सचमुच पश्चाताप करता है, उसे पाप उससे बिलकुल भिन्न वस्तु दिखता है जैसा वह उस मनुष्य को दिखता है जिसने पश्चाताप नहीं किया।

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