व्याख्यान 13 (253 में से)

15. जो लोग परमेश्वर के लिए बहुत थोड़ा कर रहे हैं, या जो परमेश्वर के लिए बहुत थोड़ा पूरा कर पाते हैं

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अध्याय 2: झूठे अंगीकार करनेवाले।

15. जो लोग परमेश्वर के लिए बहुत थोड़ा कर रहे हैं, या जो परमेश्वर के लिए बहुत थोड़ा पूरा कर पाते हैं, उनके विषय में उचित रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि वे उसकी सेवा करते हैं।

मान लीजिए आप परमेश्वर के सेवक होने का अंगीकार करनेवाले किसी व्यक्ति से पूछें, “आप परमेश्वर के लिए क्या कर रहे हैं? क्या आप कुछ पूरा कर रहे हैं? क्या आप किन्हीं पापियों के मन-परिवर्तन में साधन बन रहे हैं?

क्या आप धर्म के पक्ष में लोगों पर प्रभाव डाल रहे हैं, या मसीह के कार्य को आगे बढ़ाने में सहायता कर रहे हैं?”

वह उत्तर देता है, “अरे, मैं नहीं जानता; मुझे आशा तो है; मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि मैं सचमुच परमेश्वर से प्रेम करता हूँ; परन्तु मैं नहीं जानता कि इस समय मैं कोई विशेष काम कर रहा हूँ।” क्या वह मनुष्य परमेश्वर की सेवा कर रहा है! या क्या वह अपने देवताओं की सेवा कर रहा है? “मैं कभी-कभी पापियों से बात करता हूँ,” वह कहता है, “परन्तु वे अधिक कुछ अनुभव करते नहीं लगते।” तो फिर आप स्वयं अनुभव नहीं करते। यदि आपका हृदय उसमें नहीं है, तो कोई आश्चर्य नहीं कि आप पापियों को अनुभव नहीं करा सकते। इसके विपरीत, यदि आप अपना हृदय उस काम में लगाकर अपना कर्तव्य करें, तो पापी अनुभव किए बिना नहीं रह सकते।

16. जो लोग धर्म में उपयोगिता की अपेक्षा सुख की खोज करते हैं, वे अपने देवताओं की सेवा कर रहे हैं।

उनका धर्म पूरी तरह स्वार्थपूर्ण है। वे धर्म का आनन्द लेना चाहते हैं, और हर समय यही पूछते रहते हैं कि वे मन की सुखद दशाएँ कैसे पा सकते हैं, और धार्मिक कार्यों में वे कैसे आनन्दपूर्वक उत्तेजित हो सकते हैं। और वे केवल ऐसी ही सभाओं में जाएँगे, और केवल ऐसे ही प्रचार के नीचे बैठेंगे, जो उन्हें सुखी करे; यह प्रश्न कभी नहीं पूछते कि सबसे अधिक भलाई करने का मार्ग वही है या नहीं। अब, मान लीजिए आपका सेवक ऐसा करे, और लगातार यही उपाय सोचता रहे कि वह कैसे मौज करे, और यदि वह सोचे कि बैठक में सोफ़े पर लेटकर, सिर के नीचे मुलायम परों का तकिया रखकर, और पंखा झलने के लिए एक दूसरे सेवक को लगाकर वह सबसे अधिक सुखी हो सकता है, और उस काम को करने से इन्कार करे जिसमें आपने उसे लगाया है, और जिसकी आपके हित को तत्काल आवश्यकता है; आपके लिए काम करने की इच्छा, और आपके हित की चिन्ता, और अपनी सारी शक्तियों के साथ आपकी सेवा में अपने आप को लगा देने की तत्परता दिखाने के बदले, वह केवल सुखी रहना चाहता है! यहोवा के सेवक होने का अंगीकार करनेवाले उन लोगों के साथ भी ठीक ऐसा ही है, जो अपनी सुन्दर गद्दी पर बैठे रहने, और अपने पादरी से अपना पोषण करवाने के अतिरिक्त कुछ नहीं करना चाहते। भलाई करने का मार्ग खोजने के बदले, वे केवल सुखी होने का मार्ग खोजते हैं। उनकी दैनिक प्रार्थना मन-परिवर्तन पाए हुए तरसुस के शाऊल की प्रार्थना के समान यह नहीं होती,

“हे प्रभु, तू मुझ से क्या करवाना चाहता है?” बल्कि यह, “हे प्रभु, मुझे बता कि मैं कैसे सुखी हो सकता हूँ।” क्या यह यीशु मसीह की आत्मा है? नहीं, उसने कहा, “हे परमेश्वर, मैं तेरी इच्छा पूरी करने से प्रसन्न हूँ।” क्या यह प्रेरित पौलुस की आत्मा है? नहीं, उसने तुरन्त अपने ऊपरी वस्त्र उतार फेंके, और परिश्रम के खेत के लिए अपनी बाँहें चढ़ा लीं।

17. जो लोग धर्म में अपने उद्धार को अपना सर्वोपरि उद्देश्य बनाते हैं, वे अपने देवताओं की सेवा कर रहे हैं।

कलीसिया में बहुत से लोग हैं जो अपने आचरण से दिखाते हैं, और अपनी भाषा में खुलकर मानते भी हैं, कि उनका प्रमुख उद्देश्य अपना उद्धार पक्का करना है, और उनका बड़ा संकल्प यह है कि वे अपने प्राणों को स्वर्गीय यरूशलेम के दृढ़ परकोटों पर स्थापित कर लें, और ऊपर के कनान के सुनहरे खेतों में चलें-फिरें। यदि बाइबल भूल में नहीं है, तो ऐसे सब लोग नरक में जाएँगे। उनका धर्म शुद्ध स्वार्थ है। और “जो कोई अपना प्राण बचाना चाहे, वह उसे खोएगा, और जो कोई मेरे लिये अपना प्राण खोएगा, वह उसे बचाएगा।”

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