व्याख्यान 74 (253 में से)

3. ये सूत्र, और वे नियम जिनके अनुसार संसार में व्यापार किया जाता है, सीधे

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3. ये सूत्र, और वे नियम जिनके अनुसार संसार में व्यापार किया जाता है, सीधे यीशु मसीह के सुसमाचार के, और उस आत्मा के जो उसने प्रकट की, और उन सूत्रों के जो उसने सिखाए, और उन नियमों के विपरीत हैं जिनका पालन करने की आज्ञा उसने अपने सब अनुयायियों को नरक के दण्ड की चेतावनी के साथ दी।

यीशु मसीह ने पृथ्वी पर किस आत्मा का उदाहरण दिया? वह आत्म-त्याग की, परोपकार की, दूसरों की भलाई करने के लिए अपने आप को बलिदान करने की आत्मा थी। उसने वही आत्मा प्रकट की जो परमेश्वर में है, जो दूसरों की भलाई करने में अपने परोपकारी हृदय को तृप्त करने के लिए अपने आप से बाहर निकलने में अपने असीम आनन्द का अनुभव करता है। सुसमाचार का धर्म यही है, कि परमेश्वर के समान बनें, न केवल भलाई करें, वरन उसमें आनन्द भी लें, भलाई करने के लिए आनन्द के साथ अपने आप से बाहर निकलें। सुसमाचार का सूत्र यह है:

“लेने से देना धन्य है।” और फिर, “हर एक अपनी ही हित की नहीं, वरन दूसरों की हित की भी चिन्ता करे।” संसार का व्यापारी क्या कहता है?

“पहले अपना भला देखो।” ये सूत्र ठीक उन्हीं मनुष्यों ने बनाए थे जो सुसमाचार के विषय में अन्यजातियों से अधिक न कुछ जानते थे और न कुछ परवाह करते थे। मसीही ऐसे सूत्रों के अनुसार क्यों चलें?

4. व्यापार के कामों में संसार के सदृश बनना उन प्रतिज्ञाओं का सीधा खण्डन है जो मसीही कलीसिया में प्रवेश करते समय करते हैं।

जब आप कलीसिया में प्रवेश करते हैं तब आप क्या प्रतिज्ञा करते हैं? क्या यह नहीं कि आप संसार को त्याग देंगे और परमेश्वर के लिए जीएँगे, और यीशु मसीह की आत्मा से प्रेरित होंगे, और परमेश्वर से सर्वोच्च प्रेम रखेंगे, और स्वयं का त्याग करेंगे, और अपने आप को परमेश्वर की महिमा करने और मनुष्यों की भलाई करने के लिए सौंप देंगे? आप अंगीकार करते हैं कि आप संसार से, उसके सम्मानों से, या उसके धन से प्रेम नहीं रखते। प्रभु-भोज की मेज़ के चारों ओर, अपने उद्धारकर्ता की तोड़ी हुई देह पर हाथ रखकर, आप घोषणा करते हैं कि ये आपके सिद्धान्त हैं, और इन्हीं सूत्रों के अनुसार जीने की प्रतिज्ञा करते हैं। और फिर आप क्या करते हैं? क्या आप वहाँ से जाकर उन सूत्रों और नियमों पर चलने लगते हैं जिन्हें ऐसे मनुष्यों ने गढ़ा है जिनका खुला सिद्धान्त संसार का प्रेम है, और जिनका खुला उद्देश्य संसार को प्राप्त करना है? क्या यही आपकी रीति है? तो, मैं आपसे कह दूँ, यदि आप पश्चाताप न करें, तो आप दण्ड की आज्ञा पाएँगे।

यह बात कि कोई नास्तिक, या कोई लम्पट दुष्ट, नरक में जाएगा, इस बात से अधिक निश्चित नहीं है कि मसीही होने का अंगीकार करनेवाले वे सब लोग जो संसार के सदृश बनते हैं, वहाँ जाएँगे। उनका दोष दुगना है। उन्होंने परमेश्वर के सामने एक भिन्न मार्ग पर चलने की शपथ खाई है, और जब वे संसार के व्यापारिक सिद्धान्तों पर चलते हैं, तो वे दिखाते हैं कि वे झूठी शपथ खानेवाले दुष्ट हैं।

5. संसार के सदृश बनना सुसमाचार के सिद्धान्तों का ऐसा प्रत्यक्ष खण्डन है कि जब पापी उसे देखते हैं, तो वे उससे स्वयं सुसमाचार के सच्चे स्वभाव और उद्देश्य को न समझते हैं और न समझ सकते हैं।

वे यह कैसे समझ सकते हैं कि सुसमाचार का उद्देश्य मनुष्यों को संसार के प्रेम से ऊपर, और संसार के प्रभाव से ऊपर उठाना, और उन्हें ऊँचे स्थान पर रखना है, ताकि वे पूर्णतया भिन्न सिद्धान्तों पर जीवन बिताएँ? जब वे मसीही होने का अंगीकार करनेवालों को अन्य मनुष्यों के समान ही सिद्धान्तों पर चलते देखते हैं, तो वे सुसमाचार के सच्चे सिद्धान्तों को कैसे समझ सकते हैं, या यह कैसे जान सकते हैं कि स्वर्गीय मन, आत्म-त्याग, परोपकार इत्यादि से उसका क्या अर्थ है?

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