व्याख्यान 58 (253 में से)

आगे बढ़ जाते हैं, ताकि सांसारिक समाचार, या वाद-विवाद, या कुछ और पढ़ें। दूसरा वर्ग, अर्थात

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आगे बढ़ जाते हैं, ताकि सांसारिक समाचार, या वाद-विवाद, या कुछ और पढ़ें। इसके विपरीत दूसरा वर्ग, अर्थात परमेश्वर और मनुष्य के सच्चे मित्र, जागृतियों की प्रगति के बारे में जानना पसन्द करते हैं। वे धार्मिक पत्र पढ़ना पसन्द करते हैं, और जब वे उसे उठाते हैं, तो पहला काम यह करते हैं कि उस पर सरसरी दृष्टि डालकर देखें कि कहाँ-कहाँ जागृतियाँ हो रही हैं, और वहाँ वे अपने प्राणों को तृप्त करते हैं, और परमेश्वर की महिमा करते हैं। और मिशनों के विषय में भी ऐसा ही है: उनका मन मिशनरियों के साथ-साथ जाता है, और जब वे सुनते हैं कि प्रभु ने किसी मिशन पर अपना आत्मा उंडेला है, तो वे अपने भीतर पवित्र आनन्द की एक उमंग दौड़ती हुई अनुभव करते हैं।

27. वे व्यवस्था पर आधारित, कष्टदायक, नकारात्मक धर्म से ऊँची किसी बात का लक्ष्य नहीं रखते।

मसीह का प्रेम उन्हें पाप के विरुद्ध निरन्तर युद्ध करने, और अपनी सामर्थ भर सारी भलाई करने के लिए निरन्तर चौकस रहने को विवश नहीं करता। वरन् वे जो कुछ करते हैं, वह केवल इसलिए करते हैं कि वे सोचते हैं कि उन्हें करना ही पड़ेगा। और वे एक ऐसी भक्ति बनाए रखते हैं जो औपचारिक, हृदयहीन और निकम्मी है।

28. भलाई करने के लिए कलीसिया के सब विशेष अभियानों में वे अनिच्छा से शामिल होते हैं।

यदि लगातार चलनेवाली सभाओं का प्रस्ताव रखा जाए, तो आप साधारणतः इस प्रकार के लोगों को पीछे हटते, और जब तक हो सके आपत्तियाँ उठाते और कठिनाइयाँ खड़ी करते पाएँगे। यदि कोई और विशेष प्रयत्न प्रस्तावित हो, तो वे अनिच्छा से आते हैं, और पुराने अच्छे मार्ग को ही अधिक पसन्द करते हैं। अपनी आशा बनाए रखने के लिए हर वर्ष अपने धर्म में इतना कुछ जोड़ने के लिए विवश होने पर वे चिढ़ जाते हैं।

29. उन्हें गुप्त प्रार्थना में आनन्द नहीं आता।

वे अपनी कोठरियों में इसलिए प्रार्थना नहीं करते कि उन्हें प्रार्थना करने से प्रेम है, बल्कि इसलिए कि वे सोचते हैं कि यह उनका कर्तव्य है, और उसकी उपेक्षा करने का साहस नहीं करते।

30. उन्हें बाइबल में आनन्द नहीं आता।

वे बाइबल इसलिए नहीं पढ़ते कि वह उनके प्राणों को मीठी लगती है, मधु से और टपकनेवाले छत्ते से भी बढ़कर मीठी। वे उसके पढ़ने का वैसा “आनन्द” नहीं लेते जैसा कोई व्यक्ति सबसे उत्तम सुखों का आनन्द लेता है।

वे उसे इसलिए पढ़ते हैं कि उसे पढ़ना उनका कर्तव्य है; और मसीही होने का अंगीकार करना और बाइबल न पढ़ना ठीक नहीं होगा: परन्तु वास्तव में उन्हें वह एक नीरस पुस्तक लगती है।

31. उन्हें प्रार्थना-सभाओं में आनन्द नहीं आता।

छोटे-छोटे बहाने उन्हें दूर रखते हैं। वे तब तक कभी नहीं जाते जब तक उन्हें दिखावा बनाए रखने के लिए, या अपनी आशा बनाए रखने के लिए, जाना आवश्यक न लगे। और जब वे जाते भी हैं, तो उनके प्राण प्रेम से पिघलने और प्रज्वलित होने के बजाय, वे ठंडे, उदासीन, सुस्त बने रहते हैं, और सभा समाप्त होने पर प्रसन्न होते हैं।

32. निःस्वार्थता का अर्थ क्या है, यह समझने में उन्हें बड़ी कठिनाई होती है।

परमेश्वर की सेवा इसलिए करना कि वे उससे प्रेम करते हैं, न कि प्रतिफल के लिए—यह वह बात है जिसे वे नहीं समझते।

33. उनके विचार इस प्रश्न पर व्याकुलता से नहीं टिके रहते, कि संसार का मन परमेश्वर की ओर कब फिरेगा?

उनके मन ऐसे विचारों से वेदना में नहीं पड़ते, कि आह, दुष्टता कब तक प्रबल रहेगी? आह, यह दयनीय संसार पाप और मृत्यु से कब छुटकारा पाएगा? आह, मनुष्य परमेश्वर के विरुद्ध पाप करना कब छोड़ेंगे? वे इस प्रश्न के बारे में कहीं अधिक सोचते हैं, कि मैं कब मरकर स्वर्ग जाऊँगा, और अपनी सारी परीक्षाओं और चिन्ताओं से छुटकारा पाऊँगा?

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